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प्रेम स्पंदन .....

प्रेम स्पंदन ....

नयन आलिंगन.....
अपरिभाषित और अलौकिक.....
प्रेम स्पंदन//

मौन आवरण में ....
अधरों का अधरों से....
मधुर अभिनंदन//

महकें स्वप्न....
नेत्र विला में....
जैसे महके.....
हरदम चंदन//

मेघ वृष्टि की.....
अनुभूति को ....
कह पाये न....

प्रेम अगन में....
भीगा ये तन//

विछोह वेदना में....
नयन सागर के.....
तोड़ किनारे....

सुर्ख कपोलों पर दो बूंदें.....
पिया मिलन को .....
करती क्रन्दन//

सुशील सरना
मौलिक एवं अप्रकाशित

Views: 916

Comment

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Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on July 2, 2014 at 10:05am

कुछ शब्द संयोजन का नवीन प्रयोग हुआ है, अच्छा लगा (इस पर विद्वजनों की टिपण्णी ही कुछ कहेगी)  

सुन्दर रचना के लिए हार्दिक बधाई 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on July 2, 2014 at 8:54am

खूबसूरत बिम्बों के प्रयोग से रचना सरस व सुन्दर बन पड़ी है बहुत बहुत बधाई आपको

Comment by Meena Pathak on July 1, 2014 at 8:24pm

बहुत सुन्दर ..सादर बधाई आदरणीय 

Comment by बृजेश नीरज on July 1, 2014 at 7:56pm
बहुत सुन्दर रचना। आपको हार्दिक बधाई आदरणीय।
Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on July 1, 2014 at 6:06pm

सरना जी/ नयन आलिंगन बिलकुल नया प्रयोग है i नेत्र विला भी चमत्कृत करता है i कविता वैसी हे है जैसी हम आपसे चाहते है i

कृपया ध्यान दे...

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