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सब की हम पर ही नजर है बज्म में अब

२१२२ ११२२  २१२२

 

कुछ जलाना तो  चिरागों को जलाओं

पी के तम को ये जहाँ रोशन बनाओ

 

चल पड़ा है वो मसीहा जग बदलने

राह से कांटे सभी उसको हटाओ

 

आज चिलमन है हमारे दरमिया क्यों

नाजनीनो यूं न हमको तुम सताओ

 

सब की हम पर ही नजर है बज्म में अब

जाम नजरों से हमें छुपकर पिलाओं

 

है सबब कोई खफा जो हमसे हो तुम

बेकली दिल की बढ़ी  कुछ तो बताओ

 

बात बज्मों में निगाहें ही करेंगी

तुम भी जो कहना इशारों में बताओं

 

देख कर हमको शरम से लाल हो तुम

बंद कर ली लो जी आँखे मत लजाओ

 

जीना बचपन को जवानी में अगर हो

नाव कागज़ की ये बारिश में चलाओ

 

देखना हो जो पुराना प्यार माँ का

घर के कोने में कहीं खुद को छिपाओ

 

मौलिक व अप्रकाशित 

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Comment

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Comment by Dr Ashutosh Mishra on June 27, 2014 at 1:53pm

आदरणीय डॉ विजय जी रचना पर आपकी इस उत्साहवर्धक प्रतिक्रिया के लिए तहे दिल धन्यवाद सादर 

Comment by Dr Ashutosh Mishra on June 27, 2014 at 1:52pm

आदरणीय गोपाल सर ..आपके शब्द मुझे रचनात्मक उर्जा से लवरेज कर रहे हैं आपका aआशीर्वाद सदैव मिलता रहे ऐसी कामना के साथ सादर प्रणाम के साथ 

Comment by Dr Ashutosh Mishra on June 27, 2014 at 1:49pm

आदरणीया कुंती जी ..मेरे इस प्रयास पर आपकी उत्साहवर्धक प्रतिक्रिया के लिए तहे दिल धन्यवाद सादर 

Comment by Dr Ashutosh Mishra on June 27, 2014 at 1:48pm

आदरणीय अभिनव जी ..आपका सतत प्रोत्साहन मुझे मिला है ..एक रचनाकार को जो हौसला चाहिए वो मुझे हमेशा आपसे मिला है ..ये स्नेह यथावत रहे ऐसी कामना करता हूँ ..सादर धन्यवाद के साथ 

Comment by Dr Ashutosh Mishra on June 27, 2014 at 1:47pm

राम शिरोमणि जी ..हौसला बढाते आपके शब्दों के लिए तहे दिल शुक्रिया ..सादर 

Comment by Dr. Vijai Shanker on June 26, 2014 at 11:40pm
जीना बचपन को जवानी में अगर हो
नाव कागज़ की ये बारिश में चलाओ
देखना हो जो पुराना प्यार माँ का
घर के कोने में कहीं खुद को छिपाओ
बहुत आकर्षक , बधाई , सादर .
Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on June 26, 2014 at 9:09pm

मित्र

बड़ी सुन्दर  गजल है i आख़री अशआर ने तो जान ही निकाल ली i

Comment by coontee mukerji on June 26, 2014 at 7:30pm

जीना बचपन को जवानी में अगर हो

नाव कागज़ की ये बारिश में चलाओ.....बहुत सुंदर.

 

Comment by Abhinav Arun on June 26, 2014 at 4:50pm
आ. डॉ आशुतोष जी प्रभावपूर्ण शेरो की सुन्दर ग़ज़ल हुई है मुबराक्बाद !!
Comment by ram shiromani pathak on June 26, 2014 at 3:05pm

बहुत ही सुन्दर ग़ज़ल आदरणीय। हार्दिक बधाई आपको। …। सादर  

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