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साथ जीने की सज़ा

चाहतों ने गुलज़मीं पे चाँदनी जब छा दिया

आहटों ने बढ़ तराना प्यार का तब गा दिया |

 

हाथ क़ैदी की तरह सहमे हुए थे क़ैद में

क़ैदख़ाने में किसी ने दिल थमा बहका दिया |

 

पाँव में थीं बेड़ियाँ, बेदम नज़र, मंजिल न थी

हौसले ने वक़्त पे सिर से कफ़न फहरा दिया |

 

होंठ काँटों के हवाले खूँ से लथपथ थे पड़े

फूल की ख़ुशबू ने टाँके खींचकर महका दिया |

 

मातमी अंदाज़ में लोगों का जमघट था लगा

साथ जीने की सज़ा ने मौत को झुठला दिया |

 

(मौलिक एवं अप्रकाशित )

--- संतलाल करुण

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Comment

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Comment by Santlal Karun on June 23, 2014 at 4:24pm

आदरणीया मीना जी, 

आप के प्रशंसात्मक उद्गार के प्रति सादर आभार !

Comment by Santlal Karun on June 23, 2014 at 4:22pm

आदरणीय गिरिराज जी ,

जो आप लोगों से सीखता हो, वह आप को क्या सिखाएगा | रचना की प्रशंसा के लिए सहृदय आभार !

Comment by Santlal Karun on June 23, 2014 at 4:19pm

आदरणीया महिमा जी,

रचना की सराहना के लिए हार्दिक आभार !

Comment by MAHIMA SHREE on June 19, 2014 at 7:20pm

बहुत ही सुंदर भाव ... हार्दिक बधाई आपको सादर


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on June 19, 2014 at 10:38am

आदरणीय संत लाल भाई , खूब सूरत गज़ल कही है आपकोअ बधाई ॥ मेरे खयाल से आपके 2122  2122  2122 212  बह्र मे गज़ल कही है , आदरणीय बह्र ऊपर लिख देने से हम सीखने वालों को समझने मे आसानी होती है अतः आपसे अनुरोध है कि बह्र ज़रूर दे दिया कीजिये । सादर !

Comment by Meena Pathak on June 18, 2014 at 4:22pm

बहुत सुन्दर गज़ल .. बधाई | सादर 

Comment by mrs manjari pandey on June 18, 2014 at 10:55am
आदरणीय संतलाल सर ,प्रणाम। आपकी टिप्पणी से मन गदगद हो गया। मै भी ओबीओ में अपेक्षित समय नहीं दे पाई स्कूल के बाद कितना वक़्त बचता है आप तो जानते हैं. इधर मंच की सक्रियता अधिक हो गयी थी. प्रत्येक महीने साहित्यिक गोष्ठी भी प्रारम्भ कर दी है. छुट्टियाँ प्रारम्भ होने के साथ मै बेटी के पास आस्ट्रेलिया आ गई हूँ ऑगस्त में पुनः विद्यालय ज्वाइन करूंगी. सर आप कैसे है ? अभी सुल्तानपुर ही हैं न। . . आपकी वेबसाइट जो थी कृपया लिख के भेज दीजियेगा क्योंकि थोड़ा विस्मृत हो रहा है. समय समय पर आपका निर्देशन मै प्राप्त करती रहूंगी. धन्यवाद सर.
आपकी सुन्दर ग़ज़ल के लिए हार्दिक बधाई
Comment by वेदिका on June 18, 2014 at 12:55am

सुंदर रचना पर हार्दिक बधाई आ० संतलाल जी!

क्या यह गज़ल है?

सादर

Comment by coontee mukerji on June 17, 2014 at 5:02pm

बहुत सुंदर गज़ल....हार्दिक बधाई.

Comment by Shashi Mehra on June 17, 2014 at 11:01am

sundar

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