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गजल : तंग हो हाथ पर दिल बड़ा कीजिए//शकील जमशेदपुरी

बह्र : 212/212/212/212
———————————————

तंग हो हाथ पर दिल बड़ा कीजिए
चाहे जितने भी गम हों हंसा कीजिए

ति​तलियां लौट जाती हैं हो कर उदास
सुब्ह में फूल बन कर खिला कीजिए

है जलन उनको मैं चाहता हूं तुम्हें
मत सहेली की बातें सुना कीजिए

प्यार हो जाएगा है ये दावा मेरा
आप गजलें हमारी पढ़ा कीजिए

चांद से आपकी क्यों बहस हो गई
ऐसे वैसों के मुंह मत लगा कीजिए

यूं मकां है मगर घर ये हो जाएगा
बनके मेहमान कुछ दिन रहा कीजिए

फिर कहीं होने पाए न ये हादसा
दिल किसी का न टूटे दुआ कीजिए

यादों की इन सलाखों में घुटता है मन
हो गई इंतहा अब रिहा कीजिए

बस गुजारिश है इतनी मेरी आपसे
हंस के दुनिया से मुझको विदा कीजिए

-शकील जमशेदपुरी

________________________________

*मौलिक एवं अप्रकाशित

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Comment

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Comment by vijay nikore on April 28, 2014 at 11:50am

बहुत ही अच्छी गज़ल कही है। बधाई।

Comment by SALIM RAZA REWA on April 27, 2014 at 8:36pm

तंग हो हाथ पर दिल बड़ा कीजिए
चाहे जितने भी गम हों हंसा कीजिए

ति​तलियां लौट जाती हैं हो कर उदास
सुब्ह में फूल बन कर खिला कीजिए

बस गुजारिश है इतनी मेरी आपसे

हंस के दुनिया से मुझको विदा कीजिए

shakil bhai bahut khubsurat gazal hui haih mubarakbad kubul kijie 

Comment by Dr Ashutosh Mishra on April 26, 2014 at 2:31pm

है जलन उनको मैं चाहता हूं तुम्हें
मत सहेली की बातें सुना कीजिए....बिलकुल सही 

प्यार हो जाएगा है ये दावा मेरा
आप गजलें हमारी पढ़ा कीजिए.....आपका दावा हकीकत बने 

यादों की इन सलाखों में घुटता है मन
हो गई इंतहा अब रिहा कीजिए..बहुत बढ़िया ...भाई शकील जी इस कामयाब ग़ज़ल के लिए तहे दिल बधाई सादर 

Comment by शकील समर on April 24, 2014 at 6:08pm

जी...जी आदरणरीय गिरि​राज सर, सहमत हूं आपकी बात से दुरुस्त कर लूंगा। आभार।


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on April 24, 2014 at 6:05pm

आदरनीय शकील भाई , बहुत खूबसूरत गज़ल कही है , सभी अशाअर लाजवाब हुये हैं , दिली दाद कुबूल करें ॥

एक  छोटी बातें कहना चाहता हूँ  - हंस को हँस कर लीजियेगा , क्योंकि हंस भी एक शब्द है , एक पक्षी का नाम है ।

Comment by शकील समर on April 24, 2014 at 4:36pm

आप सभी का हृदय से आभारी हूं।

Comment by विजय मिश्र on April 24, 2014 at 3:03pm
शकील भाई ,
"प्यार हो जाएगा है ये दावा मेरा
आप गजलें हमारी पढ़ा कीजिए

चांद से आपकी क्यों बहस हो गई
ऐसे वैसों के मुंह मत लगा कीजिए |"

गनीमत है कि इस मिजाज के दो ही मिसरे हैं ,दो-तीन और होते तो कितनों का दिल निकलकर बाहर आ जाता ! बेहतरीन गोई ,दिली दाद कबूल फरमाएँ |
Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on April 24, 2014 at 11:31am

खूबसूरत अश’आर हैं शकील साहब। दाद कुबूल कीजिए

Comment by Ashish Srivastava on April 24, 2014 at 10:13am
Bhai bas ek hi baat samjh aayi
Khoobsurat shilp khoobsurat bhaav

Aanad aa gaya
Comment by umesh katara on April 23, 2014 at 8:03pm

वाहहहहहहह वाहहहहहहहहहहहह

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