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ग़ज़ल …. है बहाना आज फिर शुभकामनाओं के लिये

 रदीफ़ -के लिये 
काफ़िया -शुभकामनाओं ,संभावनाओं , याचनाओं 
अर्कान -2122 ,2122 ,2122 ,212 

है बहाना आज फिर शुभकामनाओं के लिये 
आँधियों की धूल में संभावनाओं के लिये . 

नींद क्यों आती नहीं ये ख्वाब हैं पसरे हुये 
हो गई बंजर जमीनें भावनाओं के लिये .

है बड़ा मुश्किल समझना जिंदगी की धार को 
माँगते अधिकार हैं सब वर्जनाओं के लिये .

खौफ़ से जिसके हमेशा थरथराई जिंदगी 
जानता हूँ वो झुका है याचनाओं के लिये .

गुनगुनाती थी मुझे छू कर कभी मदहोश सी 
अब तरस जाता हूँ उन बहकी हवाओं के लिये .

सो रहा कबसे अरे अब जागना होगा तुझे 
गीदड़ों की भीड़ में यम गर्जनाओं के लिये .

-ललित मोहन पन्त 
18.04.2014
01.04 रात 
"मौलिक व अप्रकाशित"

Views: 1054

Comment

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Comment by Maheshwari Kaneri on April 20, 2014 at 7:38pm

  बहुत खूबसूरत ग़ज़ल..

Comment by umesh katara on April 19, 2014 at 8:41pm

वाहहहह वाहहहहह क्या कहने सर खूबसूरत गज़ल वाहहह


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on April 19, 2014 at 8:28pm

नींद क्यों आती नहीं ये ख्वाब हैं पसरे हुये 
हो गई बंजर जमीनें भावनाओं के लिये . --- बहुत खूब सूरत शे र ,

आदरणीय ललित भाई , पूरी गज़ल के लिये आपको बहुत बहुत बधाइयाँ ।

Comment by savitamishra on April 19, 2014 at 7:57pm

खूबसूरत ग़ज़ल

Comment by coontee mukerji on April 19, 2014 at 7:06pm

सो रहा कबसे अरे अब जागना होगा तुझे 
गीदड़ों की भीड़ में यम गर्जनाओं के लिये ....बहुत खूब.

Comment by dr lalit mohan pant on April 19, 2014 at 1:15am

 आ  .  गीतिका 'वेदिका जी जितेन्द्र 'गीत जी Mukesh Verma "Chiragh" जी पेला  जी ,नादिर खान साहब  आप सब की जर्रा नवाजी का शुक्रिया  … मुझे अपनी गलती महसूस हो गई  … मैं उसका काफिया नहीं बदल पा रहा हूँ इसलिए इसे इस ग़ज़ल से हटाना चाहूँगा  … इसी तरह से रास्ता दिखाते रहें  … 

Comment by नादिर ख़ान on April 18, 2014 at 10:54pm

है बहाना आज फिर शुभकामनाओं के लिये 
आँधियों की धूल में संभावनाओं के लिये . आदरणीय मोहन जी बहुत ही कमाल का मतला है बहुत खूब ..

नींद क्यों आती नहीं ये ख्वाब हैं पसरे हुये 
हो गई बंजर जमीनें भावनाओं के लिये ....अगर मिसरा ए उला को यूँ  किया जाए (नींद अब आती नहीं जब ख्वाब हैं पसरे हुये)

गुनगुनाती थी मुझे छू कर कभी मदहोश सी 
अब तरस जाता हूँ उन बहकी हवाओं के लिये ... काफिये का निर्वाहन नहीं हुआ है कृपया चेक कर लें ।

Comment by Krishnasingh Pela on April 18, 2014 at 1:26pm

हार्दिक बधाइ खूबसूरत ग़ज़ल के लिए अादरणीय ललित पन्त जी । 

Comment by Mukesh Verma "Chiragh" on April 18, 2014 at 11:26am

आदरणीय ललित जी
इस सुंदर ग़ज़ल और खूबसूरत बयानी के लिए मेरी तरफ से हज़ारों दाद हाजिर है..
इस शेर के काफ़िए पर दोबारा नज़र डालिएगा.

गुनगुनाती थी मुझे छू कर कभी मदहोश सी
अब तरस जाता हूँ उन बहकी हवाओं के लिये .

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on April 18, 2014 at 9:49am

गुनगुनाती थी मुझे छू कर कभी मदहोश सी 
अब तरस जाता हूँ उन बहकी हवाओं के लिये...........बहुत खुबसूरत

हार्दिक बधाई स्वीकारें आदरणीय ललित जी

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