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Dr lalit mohan pant's Blog (14)

ग़ज़ल -

रदीफ़- रही

काफ़िया -चलती , ढलती

अर्कान -२१२२,२१२२,२१२२,२१२

दायरों में ही सिमट कर जिंदगी ढलती रही

तुम फलक थे मैं जमीं औ कश्मकश चलती रही।

मायने थे रौशनी के रात भर उनके लिये

लौ दिये की थरथराती ताक में जलती रही।

दे रहा दाता मुझे खुशियाँ हमेशा बेशुमार

फिर कमी किस बात की जाने हमें खलती रही।

ज़िद ज़माने को दिखाने की रही थी बेवजह

जानि - पहिचानी मुसीबत कोख में पलती रही।

हौसला रखकर फ़तह का जंग हम…

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Added by dr lalit mohan pant on September 3, 2014 at 1:30am — 9 Comments

आओ ! जश्न मनायें …

कभी कभी

जब/ वाणी ,कलम और अनुभूतियाँ

यूँ छिटक जाते हैं

जैसे पहाड़ी बाँध से छूटी

उत्श्रिङ्खल लहरें

बहा ले जाती हैं /अचानक

खुशियाँ /सपने /और जिंदगियाँ …

जब /बदहवास रिश्ते

बहा नहीं पाते

अपनी आँखों और मन से

पीड़ा /स्मृतियाँ

और वो

जो ढह जाता है

ताश के महल की तरह

जब एक हूक उठती है

सीने में /और

भर देती है

अनंत आसमान का

सारा खालीपन

कभी सारा समन्दर

और उसका खारापन

जब जुगलबंदी…

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Added by dr lalit mohan pant on June 18, 2014 at 1:00am — 12 Comments

ग़ज़ल …. है बहाना आज फिर शुभकामनाओं के लिये

 रदीफ़ -के लिये 

काफ़िया -शुभकामनाओं ,संभावनाओं , याचनाओं 

अर्कान -2122 ,2122 ,2122 ,212 



है बहाना आज फिर शुभकामनाओं के लिये 

आँधियों की धूल में संभावनाओं के लिये . 



नींद क्यों आती नहीं ये ख्वाब हैं पसरे हुये 

हो गई बंजर जमीनें भावनाओं के लिये .



है बड़ा मुश्किल समझना जिंदगी की धार को 

माँगते अधिकार हैं सब वर्जनाओं…

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Added by dr lalit mohan pant on April 18, 2014 at 1:29am — 21 Comments

चलो यूँ ही समझा लें मन को …

मैं गिड़गिड़ाता रहा हूँ

रात दिन

तुम सबके सामने

जितने भी सम्बन्ध हो

कल आज और कल के

इस उम्मीद के साथ /कि

तुम थोड़ा पिघलोगे

भले ही अनिच्छा से

मेरा मान रखोगे

यह भ्रम /जीवन भर

साथ चलता रहा है

इसीलिये सब सहा है

यह सुनते ही तुम

मेरे विरोध में

खड़े हो जाओगे

और शायद फिर

मुझे गिड़गिड़ाता पाओगे

मैं अपना वक्तव्य बदलता हूँ

और इसे सार्वभौम /करता हूँ

फिर तुम्हारी और अपनी

ओर से कहता हूँ

मैं

मुझे…

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Added by dr lalit mohan pant on March 9, 2014 at 10:23pm — 14 Comments

जीभ से जो पेट तक है आग का दरिया ...(ग़ज़ल)

ग़ज़ल

२१२२ ,२१२२ ,२१२२ ,२



बेबसी की इंतिहा जब आह सुनती है 

आँसुओं से बैठ कर फिर वक़्त बुनती है.



मरहले दर मरहले बढ़ती रही वो धुँध  

जिंदगी क्यों, ये न जाने राह चुनती है. 



जीभ से जो पेट तक है आग का दरिया

फलसफों को भूख जिसमें रोज़ धुनती है. 



वो थका है कब हमारा इम्तिहाँ ले कर

रेत है जो भाड़ की हर वक़्त…

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Added by dr lalit mohan pant on November 29, 2013 at 1:30am — 10 Comments

क्यों, जीवन पर्यन्त मरीचिकायें आखेट करती है जीवन का ???

रचना पूर्व प्रकाशित होने के कारण तथा ओ बी ओ नियमों के अनुपालन के क्रम मे प्रबंधन स्तर से हटा दी गयी है, लेखक से अनुरोध है कि भविष्य में पूर्व प्रकाशित रचनाएँ ओ बी ओ पर पोस्ट न करें | (08.12.2013 / 22:35)

एडमिन
2013120807

Added by dr lalit mohan pant on November 21, 2013 at 12:00am — 10 Comments

फिर बारिशें होने लगती हैं......

फिर बारिशें होने लगती हैं......



कभी कभी

एक दावानल सा भड़क जाता है

मन के

हरे भरे /महकते

चहचहाते /किलोल करते

गर्जनाओं और वर्जनाओं के / जंगल में

डर

चीखों और चीत्कारों के साथ

हावी हो जाता है....

बेचैनी / घबराहट / घुटन / यंत्रणा

जैसे शब्द

किसी क्षण की चरम स्थितियों…

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Added by dr lalit mohan pant on November 14, 2013 at 1:30am — 11 Comments

ग़ज़ल - खोल शिखा फिर आन करें हम

मात्रा भार - 222 ,222 ,22





खोल शिखा फिर आन करें हम  

आज गरल का पान करें हम। 

ज्वालाओं के धनुष बना कर 

लपटों का संधान करें हम।  

 

अंगारों सा धधक रहा उस 

यौवन पर अभिमान करें हम।  

अँधियारा  जब छा जाये  तो  

खुद को ही दिनमान करें हम। 

समिधाओं से राख उड़ी है 

आहुति का आह्वान करें हम।

अपना कौन पराया कितना  

अब उनकी पहिचान करें हम।  

कर कौन रहा कल…

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Added by dr lalit mohan pant on October 30, 2013 at 12:00am — 16 Comments

वक़्त बदला, हैं बदले ख़यालात से ...

ग़ज़ल -

 

२१२  २१२  २१२  २१२ 

 

वक़्त बदला, हैं बदले ख़यालात से 

रौंदता ही रहा हमको लम्हात से  . 

 

क्यों मयस्सर नहीं जिंदगी में सुकूँ 

जूझता ही रहा मैं तो हालात से   . 

 

माँगता था दुआ में तिरी रहमतें

उलझनें सौंप दी तूने इफरात से .

 

जुर्रतें वक़्त की कम हुईं हैं कहाँ 

खेलती ही रहीं मेरे जज़्बात से.

तू बरस कर कहीं भूल जाये न फिर 

भीगता ही रहा पहली बरसात से. 

 

बात…

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Added by dr lalit mohan pant on October 16, 2013 at 11:00am — 16 Comments

दहकता सूरज भी /अंतिम छोर नहीं है.... ब्रह्माण्ड का ....

एक आसमान को छूता

पहाड़ सा / दरक जाता है

मेरे भीतर कहीं ..

घाटियों में भारी भरकम चट्टानें

पलक झपकते

मेरे संपूर्ण अस्तित्व को

कुचल कर

गोफन से छूटे / पत्थर की तरह

गूँज जाती हैं.

संज्ञाहीन / संवेदनाहीन

मेरे कंठ को चीर कर

निकलती मेरी चीखें

मेरे खुद के कान / सुन नहीं पाते

मैं देखता हूँ

मेरे भीतर खौलता हुआ लावा

मेरे खून को / जमा देता है

जब तुम न्याय के सिंहासन पर बैठ कर

सच की गर्दन मरोड़कर

देखते देखते निगल…

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Added by dr lalit mohan pant on October 10, 2013 at 11:00am — 16 Comments

दर्द को क्यों आज मेरी याद आई है ....

दर्द को क्यों आज मेरी याद आई है

हो रही मद्धम सफ़ों की रोशनाई है।



मुद्दत हुई जो तड़प हम भूल बैठे थे

वो ग़ज़ल फिरआज दिल ने गुनगुनाई है ?



आजमाता ही रहा मौला मुझे हर वक़्त

खूब किस्मत है गज़ब की आशनाई है।



माना जर्रा भी नहीं हम कायनात के

तेरे दर तक हर सड़क हमने बनाई है।



मेरे सूने से मकाँ में मेहमान बन के आ

बियाबाँ में बहारों की बज़्म सजाई है ।



दरिया के किनारों सा चलता रहा सफ़र

इस ओर ख्वाहिशें हैं उस ओर खुदाई है।…

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Added by dr lalit mohan pant on August 20, 2013 at 1:00pm — 15 Comments

कहीं बूढा कोई खटिया में बैठा खाँसता होगा ….…

August 8, 2013 at 2:33am

है बहुत मजबूर वो जमाने से भागता होगा 

नींद की ख्वाहिश में रात भर जागता होगा। 

 

रौशनी के चंद कतरे रखे थे अँधेरों से छुपा

क्या पता था कोई दरारों से झाँकता होगा। 

 

जमीं से उठते हुये ताकते रहे आस्माँ को हम

ये न सोचा था कभी वो हमें भी ताकता होगा। 

 

आज समझा अहले दौराँ की तिज़ारत देखकर 

शैतान भी इन्साँ से अब पनाहें माँगता होगा।

 

घटा घनघोर घिरती है गरजती है बरसती…

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Added by dr lalit mohan pant on August 8, 2013 at 2:30am — 16 Comments

जो चिरागों की लौ में पिघलता है ….

जो चिरागों की लौ में पिघलता है

वो हसरतों को रौ में बदलता है .

तेरे वजूद पे भरोसा है जिसको

आस्माँ से गिर कर भी सँभलता है.

ख्व़ाब जो नींदों के पार रहता है

वो जागती आँख में मचलता है .

चाँद है ,तारे हैं, तन्हाइयाँ भी हैं

ये दिल किसे ढूँढने निकलता है.

हर कदम गुजरा इम्तहाँ से मेरा

हर मोड़ पर रास्ता बदलता है .

हासिल ए हयात अब भी बाकी है

सिर्फ याद से दिल नहीं बहलता है

.

-ललित…

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Added by dr lalit mohan pant on July 13, 2013 at 2:30am — 6 Comments

नाद- लय की ये नदी फिर सूखती क्यों है ?

नाद- लय की ये नदी, फिर सूखती क्यों है?

निःशब्द बहती चेतना, फिर डूबती क्यों है?



है अधूरी जिंदगी ,सारे सवालों के जवाब 

वो पहाड़े याद कर, फिर भूलती क्यों है ?



जब पवन जल अग्नि, आकाश धरती से 

है जन्म लेती मूरतें, फिर टूटती क्यों है ?



जान कर भी जो कभी, लौट कर आया नहीं

ये बावरी तृष्णा उसे, फिर ढूँढती क्यों है ?



खूब रोता दिल…

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Added by dr lalit mohan pant on July 4, 2013 at 1:00am — 11 Comments

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