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सिखाते  क्यों  हमें  हो  तुम वही इतिहास की बातें
दिलों में  घोलकर  नफरत  नये  विश्वास  की बातें

*
बताओ  घर   बनेगा  क्या  हमारा   आसमानों  में
जमीनें  छीन   के   करते  सदा  आवास  की  बातें

*
कहाँ  से  हो  कठौती  में   हमारे   गंग  की  धारा
बिठाई  ना  मनों  में जब  कभी रविदास  की बातें

*
बहाकर  अश्क  भी  यारो  कहाँ  दुख  दूर  होते हैं
गमों  से  पार  पाने  को  करो   परिहास  की बातें

*
हमारे  देवता  जो  हैं  करम  तक  आ  न  पाये हैं
दिया पतझड़  हमेशा ही,  कही  मधुमास की बाते

*
हुआ  होगा  कभी  मजनू  जिसे  था प्यार रूहों से
मगर इस युग चली आयी  सदा सहवास की बातें

*
मुझे लगती नहीं अच्छी  'मुसाफिर’ फितरतें तेरी
अगर बरसात  भी हो तो  करोगे  प्यास की बातें

मैलिक व अप्रकासित
लक्ष्मण धामी ’मुसाफिर’

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Comment

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Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on April 1, 2014 at 10:24am

आदरणीय बन्दना जी आपने ग़ज़ल पर गौर फ़रमाया और प्रशंशा की , इसके लिए हार्दिक धन्यवाद .

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on April 1, 2014 at 10:22am

आदरणीय शिज्जू भाई ग़ज़ल पर आपकी टिप्प्णी से संतोष हुआ कि इस बार कोई कमी नहीं रही .हार्दिक धन्यवाद

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on April 1, 2014 at 10:20am

आदरणीय कुंती बहन उत्साहवर्धन के लिए आभार .

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on April 1, 2014 at 10:20am

आदरणीय भुवन भाई ग़ज़ल की प्रशंसा और असआरो के विश्लेषण के लिए बहुत बहुत हार्दिक धन्यवाद .

Comment by विन्ध्येश्वरी प्रसाद त्रिपाठी on April 1, 2014 at 10:20am
आदरणीय लक्ष्मण धामी जी! बहुत ही बेहतरीन गजल है। बधाई।
Comment by vandana on April 1, 2014 at 6:43am

*
कहाँ  से  हो  कठौती  में   हमारे   गंग  की  धारा
बिठाई  ना  मनों  में जब  कभी रविदास  की बातें

*
बहाकर  अश्क  भी  यारो  कहाँ  दुख  दूर  होते हैं
गमों  से  पार  पाने  को  करो   परिहास  की बातें

बढ़िया ग़ज़ल आदरणीय 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on March 31, 2014 at 6:26pm

आदरणीय लक्ष्मणजी इस गज़ल के लिये बहुत बहुत बधाई आपको

Comment by coontee mukerji on March 31, 2014 at 5:09pm

कहाँ  से  हो  कठौती  में   हमारे   गंग  की  धारा
बिठाई  ना  मनों  में जब  कभी रविदास  की बातें *......बहुत सुंदर.

Comment by भुवन निस्तेज on March 31, 2014 at 8:10am

सिखाते  क्यों  हमें  हो  तुम वही इतिहास की बातें
दिलों में  घोलकर  नफरत  नये  विश्वास  की बातें Fabulous

*
बताओ  घर   बनेगा  क्या  हमारा   आसमानों  में
जमीनें  छीन   के   करते  सदा  आवास  की  बातें The real picture of society and politics

*
कहाँ  से  हो  कठौती  में   हमारे   गंग  की  धारा
बिठाई  ना  मनों  में जब  कभी रविदास  की बातें makes mespeechless

*
बहाकर  अश्क  भी  यारो  कहाँ  दुख  दूर  होते हैं
गमों  से  पार  पाने  को  करो   परिहास  की बातें simply great philosophy

*
हमारे  देवता  जो  हैं  करम  तक  आ  न  पाये हैं
दिया पतझड़  हमेशा ही,  कही  मधुमास की बाते just great!

*
हुआ  होगा  कभी  मजनू  जिसे  था प्यार रूहों से
मगर इस युग चली आयी  सदा सहवास की बातें bitter reality

*
मुझे लगती नहीं अच्छी  'मुसाफिर’ फितरतें तेरी
अगर बरसात  भी हो तो  करोगे  प्यास की बातें what an expression!

Congratulations sir!

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on March 30, 2014 at 5:32pm

आदरणीय भाई शुशील जी ग़ज़ल कि प्रशंसा के लिए हार्दिक धन्यवाद .

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