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जुड़े रहे सम्बन्ध (दोहे)- लक्ष्मण लडीवाला 

==============

संस्कारी बच्चे बने,बुजुर्ग बने सहाय,

चले राह सन्मार्ग की, वैभव बढ़ता जाय |

 

मान बढे सहयोग से, सबका हल मिल जाय,    

सद्गुण अरु सम्पन्नता, प्रतिदिन बढती जाय |         

 

साथ रहे तो लाभ है, युवा समझते आज,

आजादी भी चाहते,  ये तनाव का साज |

 

बंधिश इतनी ही रहे, टूटे नहि तटबंध   

वीणा जैसे तार ये, जुड़े रहे सम्बन्ध |

 

मन में भरे विकार से, आपस में हो रंज

इसी वजह परिवार में, कसते रहते तंज |     

 

एकल घर परिवार में, पले बढे जो लोग,

रहते है अवसाद में, सतत सतावे रोग | 

 

दो पीढ़ी के मध्य में, रहे सोच में फर्क 

सब सदस्य करते रहे, देखो खूब वितर्क |

तालमेल बैठे नहीं, लगे ह्रदय को जर्क,

तभी संयुक्त परिवार में,बढ़ता जाए तर्क |      

 

बंधिहुई ही जब तलक, संबंधों की डोर,  

रहे सभी का मान तो, रहे ह्रदय में ठौर |

(मौलिक व् अप्रकाशित)

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Comment

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Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on April 3, 2014 at 12:17pm

सही कह रहे है आप आदरणीय, सार्थक सुझाव का सदैव ही स्वागत है, और जब अनुज से मिले तो और भी ख़ुशी होती है |

हार्दिक आभार आपका श्री सौरभ भाई जी 


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on April 3, 2014 at 3:38am

भाई अरुन अनन्त के सुझाव सार्थक और सटीक हैं, आदरणीय लक्ष्मण प्रसादजी. अच्छा लगा जब ऐसी प्रतिक्रियाएँ हमारे युवा पाठक देते हैं.
आपकी प्रस्तुति के लिए हार्दिक धन्यवाद

Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on March 28, 2014 at 5:01pm

दोहे पर गहराई से विशेश्नामक टिपण्णी कर सुझाव देने के लिए आपका हार्दिक आभार श्री अरुण शर्मा "अनंत" जी | 

Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on March 28, 2014 at 11:16am

पारिवारिक परिवेश के सदर्भ में रचित रचना पसंद केरने के लिए हार्दिक आभार श्री विजय श्री जी 

Comment by अरुन 'अनन्त' on March 27, 2014 at 2:58pm

आदरणीय लक्ष्मण सर संबंधो पर सुन्दर दोहावली रची है किन्तु आपने इससे कहीं अधिक सुगठित दोहावली रची हैं, निम्न कमियां जो मुझे समझ आईं इंगित कर रहा हूँ कृपया सुधार लें.

बच्चों की परवरिश में,बुजुर्ग बने सहाय,

चले राह सन्मार्ग की, वैभव बढ़ता जाय | परवरिश शब्द के चुनाव के कारण दोहे के प्रथम चरण में प्रवाह बाधित हो रहा है

साथ रहे तो लाभ है, युवा समझते आज,

आजादी भी चाहते,  ये तनावे का साज | टाइपिंग त्रुटि की वजह से तनाव , तनावे हो गया है.

बंधिश इतनी ही रहे, टूटे नहीं तटबंध  ( द्वतीय चरण में 12 मात्राएँ हैं नहीं को नहिं करने से ठीक हो जायेगा)

वीणा के से तार ये, जुड़े रहे सम्बन्ध | (वीणा के से की जगह वीणा जैसे कर सकते हैं)

दो पीढ़ी के मध्य में, रहे सोच में फर्क 

यही संयुक्त घरो में, लगा रहा है जर्क | ( तृतीय चरण में प्रवाह बाधित हो रहा है)

 

बंधी गाँठ में जब तलक, संबंधों की डोर,  ( प्रथम चरण में 14 मात्राएँ बंधी को बँधी कर लीजिये )

रहे सभी का मान यदि,प्रयास करे पुरजोर |

प्रयास हेतु हार्दिक बधाई स्वीकारें.

Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on March 27, 2014 at 2:49pm

दोहे पसंद करने के लिए आपका हार्दिक आभार श्री सचिन देव जी और श्री खिलेश कृष्ण श्रीवास्तव जी 

Comment by विजय मिश्र on March 27, 2014 at 2:44pm
आज के परिवेश की जीवंत और सम्पूर्ण कविता जो न केवल समस्याएं दर्शातीं हैं अपितु निदान देती बढती है |बहुत सुंदर सार चयन ,अनेक बधाईयाँ लक्ष्मणजी |
Comment by अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव on March 27, 2014 at 2:04pm

आदरणीय लक्ष्मण भाई,

संयुक्त परिवार का लाभ बताते हुए स्वतंत्र रहने के इच्छुक युवा पीढ़ी को अच्छी सीख दी है , हार्दिक बधाई  

Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on March 26, 2014 at 6:51pm

आपकी प्रतिक्रिया से मेरा प्रयास सार्थक लग रहा है | आपका हार्दिक आभार श्री जितेन्द्र गीत भाई 

Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on March 26, 2014 at 6:50pm

आपको दोहे पसंद आये, आपका हार्दिक आभार आदरणीया अन्नपूर्ण बाजपाई जी, और सरिता भाटिया जी 

कृपया ध्यान दे...

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