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(एक)

 

तुम क्या चुकाओगे

मेरी मेहनत की कीमत

मेरी जवानी

मेरे सपने

मेरी उम्मीदें

सब-कुछ तो दफ्न है

तुम्हारी इमारतों में।

 

(दो)

 

जब चलती हैं  

झुलसा देने वाली गर्म हवाएँ

कवच बन जातीं है

यही सूरज की किरणें

हमारे लिए ।

 

मुसलधार बारिश

जब हमारे बदन को छूती है

फिर से खिल उठता है  

हमारा तन

ऊर्जावान हो जाता है

जिस्म का रोम- रोम ।

 

हमारे पसीने की गंध

ला देती है गर्मी

पिघला देती है

कड़कड़ाती ठंड को ।

 

बदलता है मौसम

हमारे लिए

हम नहीं बदलते

मौसम के साथ ।

(मौलिक एवं अप्रकाशित) 

 

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Comment

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Comment by नादिर ख़ान on January 17, 2014 at 10:20pm

आदरणीय सौरभ जी हौसला अफजाई एवं मार्गदर्शन के लिए शुक्रिया ....

Comment by नादिर ख़ान on January 17, 2014 at 10:11pm

आदरणीया

कुन्ती जी ,मीना जी बहुत शुक्रिया आप दोनों का

आपने कोशिश को सराहा ...

Comment by gumnaam pithoragarhi on January 17, 2014 at 6:30pm

तुम क्या चुकाओगे मेरी मेहनत की कीमत मेरी जवानी मेरे सपने मेरी उम्मीदें सब-कुछ तो दफ्न है तुम्हारी इमारतों में। wah bahut achchi rchna hai sir ji ,,,,,,,,,,,,,,,

Comment by coontee mukerji on January 17, 2014 at 4:10pm

बहुत सुंदर...हार्दिक बधाई.

Comment by Meena Pathak on January 17, 2014 at 2:27pm

बहुत सुन्दर ,,, सादर बधाई स्वीकारें आदरणीय 


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on January 17, 2014 at 2:16pm

एक सार्थक कोशिश के लिए हृदय से बधाइयाँ स्वीकारें नादिर भाईजी.
प्रयासरत रहें. भावों के अनुसार शब्द स्वयं गहन होते जायेंगे.
शुभ-शुभ

कृपया ध्यान दे...

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