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बाप के जूते - अतुकांत (गिरिराज भंडारी)

बाप के जूते

***********

जब से

बाप के जूते

बच्चों के पैरों  में

आने लगे हैं ,

वो सही ग़लत

बाप को ही

समझाने लगे हैं  ।

बुजुर्ग बाप

अपने जीवन भर के

अनुभवों की थाती लिये

अब

किसी कोने लगा है ।

 

अपनी असहायता पर ,

अनुपयोगिता पर

कोने लगा ,

रोने लगा है ।

 

खा रहा है रोटियाँ

अकेलेपन के साथ

इसलिये कि वो ज़िन्दा है

वैसे अब जीवन में

कुछ धरा नही है ।

 

वो ज़िन्दा इसलिये है

क्योकि , वो

मरा नही है ।

************

मौलिक एवँ अप्रकाशित

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Comment by Saarthi Baidyanath on January 6, 2014 at 10:40pm

वो ज़िन्दा इसलिये है

क्योकि , वो

मरा नही है ।....सत्य और सार्थक ! चोट करती रचना ..उत्तम प्रकृति की रचना 

Comment by Abhinav Arun on January 6, 2014 at 7:51pm
सार्थक सटीक सशस्क्त आ. गिरिराज जी हार्दिक बधाई !!

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on January 6, 2014 at 7:28pm

बेहतरीन अतुकांत रचना है आदरणीय गिरिराज सर इस खूबसूरत कविता के लिये बधाई स्वीकार करें

Comment by coontee mukerji on January 6, 2014 at 5:23pm

***********

जब से

बाप के जूते

बच्चों के पैरों  में

आने लगे हैं ,

वो सही ग़लत

बाप को ही

समझाने लगे....बहुत सार्थक बात कही है.हार्दिक बधाई  गिरिराज जी.


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on January 6, 2014 at 5:00pm

आदरणीय राज बुंदॆली , रचना की सराहना और उत्साह वर्धन करने के लिये आपका हार्दिक आभार ॥


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on January 6, 2014 at 4:58pm

आदरणीय ब्रह्मचारी भाई जी , अरचना पर आपकी उत्साह वर्धक पतिक्रिया के लिये आपका आभारी हूँ ॥


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on January 6, 2014 at 4:56pm

आदरणीय जितेन्द्र भाई , रचनाअ की सराहना के लिये आपका हार्दिक आभार ॥


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on January 6, 2014 at 4:55pm

आदरणीय अखंड भाई  , रचना की सराहना के लिये आपका आभारी हूँ ॥

Comment by कवि - राज बुन्दॆली on January 6, 2014 at 4:37pm

वाह वाह वाह,,,क्या कहने हैं ,,आदरणीय बहुत ही मार्मिक रचना हेतु बधाई,,,,,,

Comment by S. C. Brahmachari on January 6, 2014 at 2:08pm
भाई गिरिराज भण्डारी जी,
इसलिए वो ज़िंदा है की जीवन मे अब कुछ धरा नहीं है ~~~ मार्मिक भाव ! ई0 अशोक कुमार की लिखी निम्न पंक्तियाँ याद आ रही हैं ~~~~~ सारे जीवन की जमा-पूंजी तुम्ही को सौंप देंगे , फिर तुम्हारे रूप मे हम एक नया जीवन जिएंगे ।
प्रेम और वात्सल्य का झरना निरंतर ही बहेगा , छू लो तुम हर इक बुलंदी , ऐसा ही वरदान देंगे ! ॥ॐ॥

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