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ग़ज़ल - आप नाटक में नया किरदार लेकर आ गये !!

पीड़ितों के बीच से तलवार लेकर आ गये 

आप नाटक में नया किरदार लेकर आ गये |

मैं समझता था हर इक शै है बहुत सस्ती यहाँ

एक दिन बाबा मुझे बाज़ार लेकर आ गये |

माँ के हाथों की बनी स्वेटर थमाई हाथ में

आप बच्चे के लिए संसार लेकर आ गये |

क़त्ल, चोरी, घूसखोरी, खुदखुशी बस, और क्या

फिर वही मनहूस सा अख़बार लेकर आ गये |

दोस्तों से अब नहीं होती हैं बातें राज़ की
चन्द लम्हे बीच में दीवार लेकर आ गये |

-- शीष नैथानी 'लिल'
(मौलिक एवं अप्रकाशित)

[ मात्रिक विन्यास - 2122 2122 2122 212 ]

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Comment by आशीष नैथानी 'सलिल' on January 4, 2014 at 5:47pm

आदरणीय भाई वीनस जी,
आदरणीया कुंती जी,
आदरणीय गिरिराज जी,
आदरणीय डॉ गोपाल नारायण जी... हौसलाअफजाई के लिए शुक्रगुजार हूँ आप सभी का !!

Comment by आशीष नैथानी 'सलिल' on January 4, 2014 at 5:45pm

आदरणीय भाई राम शिरोमणि जी,
आदरणीय नादिर ख़ान जी,
आदरणीय भाई शिज्जु जी... आप सभी का बहुत-बहुत शुक्रिया !


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on December 30, 2013 at 10:45pm

दोस्तों से अब नहीं होती हैं बातें राज़ की 
चन्द लम्हे बीच में दीवार लेकर आ गये |..............वाह वाह 

सीधे दिल में घर कर जाने वाला शेर हुआ है आ० आशीष जी 

बहुत बहुत बधाई 


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on December 27, 2013 at 10:50pm

एक-एक शेर सवा लाख का.. इससे आगे कुछ नहीं आशीष भाई.. 

मुग्ध कर दिया आपने.

दाद दाद दाद...............

Comment by SHIVA RATAN DEWRA on December 27, 2013 at 7:37pm

बहुत सुन्दर .....

Comment by MAHIMA SHREE on December 27, 2013 at 7:28pm

वाह वाह आशीष जी ..बहुत ही शानदार ... लाजवाब गजल कही है .. बेहद गहन अभिव्यक्ति हुयी है .. हर शेर एक से बढ़कर एक है ....हार्दिक बधाई आपको

Comment by Shyam Narain Verma on December 27, 2013 at 5:03pm
सुन्दर गज़ल हेतु बधाई.............
Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on December 27, 2013 at 2:56pm

सलिल जी

आपको बहुत बहुत बधाई i  अच्छी ग़ज़ल के लिए i


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on December 27, 2013 at 7:59am

आदरणीय आशीष भाई , क्या शान दार गज़ल कही है , वाह !! बहुत खूब ॥ हर शे र सुन्दर लगे , बहुत बधाई ॥

Comment by coontee mukerji on December 27, 2013 at 2:42am

दोस्तों से अब नहीं होती हैं बातें राज़ की
चन्द लम्हे बीच में दीवार लेकर आ गये |......बहुत खूब.

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