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2122 1122 22/112

आँधी से उजड़ा शजर लगता है

वो बुलन्द अब भी मगर लगता है

 

सिर्फ किरदार नये हैं उसके

इक पुराना वो समर लगता है

 

बेकरानी में कहीं गुम शायद

इक बियाबान में घर लगता है

 

वो कहीं शिद्दते- तूफ़ाँ तो नही

रास्ता छोड़ अगर लगता है

 

पत्थरों को जो मुजस्सम करे वो

तेरे हाथों में हुनर लगता है

 

काँच का दिल है ज़बाँ पे पत्थर

बच के जाऊँ मुझे डर लगता है

 

आपके दम से जहीं है ये कलम

आपका दिल पे असर लगता है

समर = किस्सा या कहानी
बेकरानी = असीम विस्तार
जहीं(जहीन) = दक्ष

मुजस्सम = साकार

-मौलिक व अप्रकाशित

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सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on December 27, 2013 at 11:28pm

हौसलाअफ़्ज़ाई के लिये आपका बहुत बहुत शुक्रिया भाई जितेन्द्र जी


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on December 27, 2013 at 11:27pm

आपका बहुत बहुत शुक्रिया आदरणीय सौरभ सर रचनाओं पर आपकी उपस्थिति सदैव उत्साहित करती है

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on December 27, 2013 at 11:25pm

काँच का दिल है ज़बाँ पे पत्थर

बच के जाऊँ मुझे डर लगता है.....वाह! क्या बात है

शानदार गजल आदरणीय शिज्जू जी, बधाई स्वीकारें


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on December 27, 2013 at 10:48pm

पत्थरों को जो मुजस्सम करे वो

तेरे हाथों में हुनर लगता है

इस शेर के गिर्द पूरी ग़ज़ल अच्छी लगी.

बधाई और हार्दिक शुभकामनाएँ


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on December 27, 2013 at 7:12pm

तारीफ के लिये आपका बहुत बहुत शुक्रिया भाई बैद्यनाथ जी


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on December 27, 2013 at 7:12pm

आदरणीय गोपाल नारायण सर हौसलाअफ़्ज़ाई के लिये आपका बहुत बहुत शुक्रिया, माफी चाहता हूँ शब्दार्थ लिखना भूल गया


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on December 27, 2013 at 7:11pm

आदरणीय गिरिराज सर हौसलाअफ़्ज़ाई के लिये आपका बहुत बहुत शुक्रिया


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on December 27, 2013 at 7:10pm

आपका आभार आदरणीया कुन्ती जी


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on December 27, 2013 at 7:07pm

आपका बहुत बहुत शुक्रिया आदरणीय वीनस जी

Comment by Saarthi Baidyanath on December 27, 2013 at 3:24pm

पत्थरों को जो मुजस्सम करे वो

तेरे हाथों में हुनर लगता है...गज़ब का ख्याल 

 

आपके दम से जहीं है ये कलम

आपका दिल पे असर लगता है...माशाल्लाह ...वाह बहुत खूब शिज्जू साहब 

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