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1)

आपस  के  संवाद में,  कितने  ही  मंतव्य !
कुछ तो हैं संयत-सहज, अक्सर हैं वायव्य
अक्सर  हैं   वायव्य,   शब्द से  चोट करारी
वैचारिक  प्रतिकार,  अहं  ने  मति भी मारी
वाक्य-वाक्य में व्यंग्य, ढंग क्या हैं मानस के ?
हे ! मानव समुदाय, यही क्या सुख आपस के ?

 
 
2)
ऊँचा   उठता  है   धुआँ,   नीचे  जाती   धार
पर सचेत-मन व्यक्ति का, यथा उचित व्यवहार  
यथा  उचित   व्यवहार,  तभी  वह  संसारी  हो
’सीख - सिखाना’  कर्म   साधना  सुखकारी  हो
चर्चा,   नहीं   विवाद,   इसी  में  सार   समूचा
शिष्ट बुद्धि,  सद्भाव,   उठाते  जन  को  ऊँचा !

************************

(मौलिक और अप्रकाशित)

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Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on December 13, 2013 at 9:58pm

उत्तम भाव लिए कुण्डलियाँ छंद बहुत सुन्दर लगी | ये भाव तो बेहद प्रभावी है -

चर्चा,   नहीं   विवाद,   इसी  में  सार   समूचा 
शिष्ट बुद्धि,  सद्भाव,   उठाते  जन  को  ऊँचा !

ढेरों बधाइयां आदरणीय 

Comment by SANDEEP KUMAR PATEL on December 13, 2013 at 8:15pm

आदरणीय सौरभ सर सादर प्रणाम ...............

बहुत ही सुन्दर कुण्डलिया छंद रचे हैं आपने ...................जय हो

बहुत बहुत बधाई आपको

Comment by Sushil Sarna on December 13, 2013 at 7:42pm

आदरणीय सौरभ जी, आपकी कुंडलिया प्रस्तुति,शब्द चयन, भाव प्रवाह अद्वितीय है   .... इस संदेशात्मक प्रस्तुति के लिए हार्दिक बढ़ाए सर 

Comment by vijay nikore on December 13, 2013 at 7:24pm

//अक्सर  हैं   वायव्य,   शब्द से  चोट करारी
वैचारिक  प्रतिकार,  अहं  ने  मति भी मारी//

//चर्चा,   नहीं   विवाद,   इसी  में  सार   समूचा
शिष्ट बुद्धि,  सद्भाव,   उठाते  जन  को  ऊँचा !//

आपकी यह दो कुण्ड्लियाँ जन-जन के लिए , देश-विदेश के लिए मार्ग-दर्शक हैं। बधाई।

 

 

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on December 13, 2013 at 7:19pm

आदरणीय सौरभ जी

कुण्डलिया के बारे में में क्या कहू i सूर्य को दीपक दिखाना आत्मापमान  करना है i  आपके शब्द चयन को प्रणाम i नीचे  जाती धार ---यह निरीक्षण  और अनुभव की बात है i प्रणाम आदरणीय i

Comment by Nilesh Shevgaonkar on December 13, 2013 at 6:36pm

बहुत सुन्दर  कुण्डलियाँ, बधाई आप को आदरणीय 

Comment by Meena Pathak on December 13, 2013 at 6:08pm

बहुत सुन्दर संदेशपरक कुण्डलियाँ, सादर बधाई आप को आदरणीय 

Comment by Satyanarayan Singh on December 13, 2013 at 5:54pm
परम आदरणीय सौरभ जी सादर,
ह्रदय को स्पर्श करने वाली और एकदम सच्ची यथार्थ और प्रेरक बातें आपने इन कुंडलियों के माध्यम से व्यक्त की है आदरणीय बहुत बहुत बधाई.

सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on December 13, 2013 at 5:11pm

भाई राहुलजी, छंद-प्रस्तुति की पंक्तियाँ आपको यदि सार्थक लग रही हैं, तो यह मेरे रचनाकर्म को मिला अनुमोदन ही है.
बहुत-बहुत धन्यवाद, भाई.


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on December 13, 2013 at 5:08pm

आदरणीया कुन्तीजी, हृदय से आभारी हूँ.

सादर

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