For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

गजल - आप के चेहरे से डर दिखने लगा।

फाइलातुन  फाइलातुन  फाइलुन

.

धीरे- धीरे सब हुनर दिखने लगा।

उसमें कितना है जहर दिखने लगा।

आँख में कैसी खराबी आ गर्इ,
राहजन ही राहबर दिखने लगा।

लाख डींगे मारिये बेषक मगर,
आप के चेहरे से डर दिखने लगा।

जो दवायें दी थीं चारागर ने कल,
उन दवाओं का असर दिखने लगा।

जो कभी झुकता नहीं था दोस्तो
अब वही सर पाँव पर दिखने लगा।

जानवर तो जानवर हैं छोडि़ये,
आदमी भी जानवर दिखने लगा।

चलते-चलते पाँव बोझिल हो गये,
है बहुत मुषिकल सफर दिखने लगा।

जबसे आया है यहाँ पर जलजला,
तबसे बेरौनक शहर दिखने लगा।

दोस्तो पीने के पानी के लिये,
एक दिन होगा गदर दिखने लगा।

मौलिक एवं अप्रकाशित

Views: 1062

Comment

You need to be a member of Open Books Online to add comments!

Join Open Books Online

Comment by Abhinav Arun on November 26, 2013 at 6:07am

सशक्त और संदेशपरक ग़ज़ल के लिए बहुत बधाई आ/ राम शिरोमणि जी 

Comment by नादिर ख़ान on November 25, 2013 at 11:30pm

आँख में कैसी खराबी आ गर्इ, 

राहजन ही राहबर दिखने लगा।

जानवर तो जानवर हैं छोडि़ये, 
आदमी भी जानवर दिखने लगा।

उम्दा गज़ल के लिए अदरणीय  राम अवध जी बहुत बहुत बधाई..

चूंकि मै  नया हूँ इस लिए   

"लाख डींगे मारिये बेशक मगर,

आप के चेहरे से डर दिखने लगा।

मिसरा ए सानी  में मात्रा को गिनने मे मुश्किल हो रही है क्या हम चेहरे को 2,2 मान सकते है (हम तो इसे 2 1 2 या 1 1 2 मानते थे ) कृपया मार्गदर्शन करें ताकि मुझे भविष्य मे समझने मे आसानी हो वरना फिर चेहरे के पर्यवाची शब्दों का प्रयोग करना पड़ेगा ।

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on November 25, 2013 at 10:25pm

विश्वकर्मा जी 

आपकी  ग़ज़ल पसंद आयी

कुछ टाइप की त्रुटियाँ है  i   ग़ज़ल के लिए बधाई i


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on November 25, 2013 at 10:00pm

वाह वाह , हर शेर लाजवाब , पूरी गज़ल बेमिसाल !!! आदरणीय राम अवध भाई ढेरों दाद स्वीकार करें !!!! क्या बात है !!!

धीरे- धीरे सब हुनर दिखने लगा।

उसमें कितना है जहर दिखने लगा।

आँख में कैसी खराबी आ गर्इ,
राहजन ही राहबर दिखने लगा।

लाख डींगे मारिये बेषक मगर,
आप के चेहरे से डर दिखने लगा। ------------- तीनो शे र लाजवाब कहे हैं !!!!!!


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on November 25, 2013 at 9:15pm

आदरणीय राम अवध सर आपकी ग़ज़ल तो निस्संदेह बेहतरीन उसके लिये दाद तो बनता है दिली दाद कुबूल करें 

//धीरे- धीरे सब हुनर दिखने लगा

उसमें कितना है जहर दिखने लग

जबसे आया है यहाँ पर जलजला
तबसे बेरौनक शहर दिखने लगा//

लेकिन इन दो अशआर में शहर और ज़हर की तक्ती जिस प्रकार की गई है उससे इन शब्दों के वज्न पर दुबारा चर्चा शुरू हो सकती है

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Activity

Admin added a discussion to the group चित्र से काव्य तक
Thumbnail

'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 178

आदरणीय काव्य-रसिको !सादर अभिवादन !!  ’चित्र से काव्य तक’ छन्दोत्सव का यह एक सौ…See More
yesterday
amita tiwari posted a blog post

गर्भनाल कब कट पाती है किसी की

कहीं भी कोई भी माँ अमर तो नहीं होती एक दिन जाना होता ही है सब की माताओ को फिर भी जानते बूझते भी…See More
yesterday
vijay nikore commented on Sushil Sarna's blog post दोहा दशम. . . . . उम्र
"भाई सुशील जी, सारे दोहे जीवन के यथार्थ में डूबे हुए हैं.. हार्दिक बधाई।"
Tuesday
vijay nikore posted a blog post

प्यार का पतझड़

एक दूसरे में आश्रय खोजतेभावनात्मक अवरोधों के दबाव मेंकभी ऐसा भी तो होता है ...समय समय से रूठ जाता…See More
Tuesday
Ashok Kumar Raktale replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-185
"प्रारम्भ (दोहे) अंत भला तो सब भला, कहते  सब ये बात। क्या आवश्यक है नहीं, इक अच्छी…"
Sunday
Ashok Kumar Raktale replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-185
"आदरणीय  जयहिंद रायपुरी जी अच्छा हायकू लिखा है आपने. किन्तु हायकू छोटी रचना है तो एक से अधिक…"
Sunday
Jaihind Raipuri replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-185
"हाइकु प्रारंभ है तो अंत भी हुआ होगा मध्य में क्या था मौलिक एवं अप्रकाशित "
Saturday
Admin replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-185
"स्वागतम"
Friday
Admin posted a discussion

"ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-185

आदरणीय साहित्य प्रेमियो,जैसाकि आप सभी को ज्ञात ही है, महा-उत्सव आयोजन दरअसल रचनाकारों, विशेषकर…See More
Apr 8
Jaihind Raipuri commented on Jaihind Raipuri 's blog post वो समझते हैं मस्ख़रा दिल हैं
"आदरणीय रवि भसीन 'शाहिद ' जी सादर अभिवादन प्रथम तो मैं क्षमाप्रार्थी हूँ देरी से आने की…"
Apr 7
Sushil Sarna posted a blog post

दोहा दशम. . . . . उम्र

दोहा दशम् . . . . उम्रठहरी- ठहरी उम्र अब, करती एक सवाल ।कहाँ गई जब जिंदगी, रहती थी खुशहाल ।।यादों…See More
Apr 6
रवि भसीन 'शाहिद' commented on Jaihind Raipuri 's blog post वो समझते हैं मस्ख़रा दिल हैं
"आदरणीय Jaihind Raipuri साहिब, नमस्कार। बढ़िया ग़ज़ल हुई है, बधाई स्वीकार करें। /ये मेरा…"
Apr 3

© 2026   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service