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आह ! वह सुख ----

पावसी मेह  में भीगा हुआ चंद्रमुख I

यौवन की दीप्ति से राशि-राशि  सजा 

जैसे प्रसन्न उत्फुल्ल नवल नीरजा I  

 

मुग्ध लुब्ध दृष्टि ----

सामने सदेह सौंदर्य एक सृष्टि I

अंग-प्रत्यंग प्रतिमान में ढले

ऐसा रूप जो ऋतुराज को छले  I

 

नयन मग्न नेत्र------

हुआ क्रियमाण कंदर्प-कुरुक्षेत्र I

उद्विग्न  प्राण इंद्रजाल में फंसे

पंच कुसुम बाण पोर-पोर में धंसे I

 

वपु धवल कान्त -----

अंतस में हा-हा वृत्ति, बहिरंग शांत  I

लज्ज -कंप भाव अनुराग से सने

अर्ध मुकुल नैनों में स्वप्न थे घने  I

 

रूप अपरूप -----

मंदिर के दीप की वर्तिका अनूप  I

दशक पूर्व जैसा ताप जैसा था प्रकाश I

आज भी वही अतृप्ति और वही प्यास I

 

एक चिर सत्य -----

भाव की सजीवता सदैव ही अमर्त्य  I

कुछ भी अतीत से नहीं अधिक समृद्ध

स्मृति  में कभी  नहीं नेह होता वृद्ध  I

 

मौलिक व् अप्रकाशित

 

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Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on December 3, 2013 at 10:57pm

सावित्री राठौर जी

आपके प्रोत्साहन  का शत - शत आभार

Comment by MAHIMA SHREE on December 3, 2013 at 8:41pm

एक चिर सत्य -----

भाव की सजीवता सदैव ही अमर्त्य  I

कुछ भी अतीत से नहीं अधिक समृद्ध

स्मृति  में कभी  नहीं नेह होता वृद्ध  I

स्मृति  में कभी  नहीं नेह होता वृद्ध  I...... वाह बेहद सुंदर भावाभिव्यक्ति आदरणीय बधाई स्वीकार करें

Comment by कल्पना रामानी on December 3, 2013 at 7:27pm

स्मृति  में कभी  नहीं नेह होता वृद्ध  I...

बहुत सुंदर...

Comment by Savitri Rathore on December 1, 2013 at 10:31pm

कुछ भी अतीत से नहीं अधिक समृद्ध

स्मृति  में कभी  नहीं नेह होता वृद्ध  I

सत्य लिखा है आपने। अतिसुन्दर  रचना !

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on December 1, 2013 at 7:43pm

विजय मिश्र जी

स्मृति  पर आपकी  मधु कामना का कृतज्ञ  हूँ i

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on December 1, 2013 at 7:41pm

नीर जी

स्मृति रचना पर आपके प्रोत्साहन से आनंदित हुआ i

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on December 1, 2013 at 7:40pm

आशीष यादव जी

स्मृति पर आपकी सराहना का आभार  i

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on December 1, 2013 at 7:37pm

आदरणीय सौरभ जी

अभी चैट पर आपसे  विचार विनिमय हुआ i

आपकी सम्मति से अधिकाधिक लाभान्वित भी हुआ i

स्मृति  आपको पसंद आयी,  मुझे माँ नो देव-प्रसाद मिल गया i

अनुग्रह हूँ i आदरणीय i अभिलाषी हूँ ऐसी ही कृपा का i  सादर  i


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on December 1, 2013 at 7:22pm

कुछ भी अतीत से नहीं अधिक समृद्ध
स्मृति  में कभी  नहीं नेह होता वृद्ध
अद्भुत ! इस मनोदशा की कविताएँ अब ढूँढनी होती हैं. भाव अत्यंत प्रखर हैं और शब्द सटीक ! जिस तारतम्यता से रचना बढती है वह अत्यंत मुग्धकारी है, आदरणीय

Comment by आशीष यादव on December 1, 2013 at 6:29pm
सच नेह एवं यादेँ कभी वृद्ध नही होतीँ।
अनुपम

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