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बताओ तो, कि कैसा लगता है ... 

किसी अंजान जगह पर 

किसी अंजान सफर पर 

किसी अंजान का साथ 

खुशी के वो अंजान पल 

साथ गुज़ारना, साथ चलना 

वो एहसास, वो पल 

बताओ तो, कि कैसा लगता है .... 

और फिर अचानक ... 

एक दिन 

किसी अंजान का बिछड़ जाना 

किसी अंजान बातों पर 

किसी अंजान कारणो पर 

फिर लौट कर न आना 

सिर्फ इंतज़ार रह जाना 

किसी से कुछ न कह पाना 

सिर्फ और सिर्फ यादें रह जाना 

बताओ तो, कि कैसा लगता है ..... 

मौलिक व अप्रकाशित 

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Comment

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सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on December 1, 2013 at 7:05pm

आदरणीय आमोद जी, आपकी इस रचना के भोलेपन ने ही मोह लिया.

अच्छा लगा.. . :-))

शुभेच्छाएँ

Comment by vijay nikore on November 27, 2013 at 6:34am

सुन्दर भावाभिव्यक्ति । बधाई।

 

सादर,

विजय निकोर


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on November 26, 2013 at 5:53pm

......एक सपने के पूरे होने जैसा !!!!!!!!!

..और सबसे प्रिय सपने के टूट कर बिखर जाने जैसा !!!!!!!!!!!!!

ऐसे एहसासों को संजोती इस प्रस्तुति पर बधाई 

वैसे सम्प्रेषण को कुछ और साधा जा सकता था..... पर शायद सहजता ही इसकी ख़ूबसूरती भी है...:)))

हार्दिक शुभकामनाएं 

Comment by Amod Kumar Srivastava on November 22, 2013 at 6:53pm

आ0 आयुब खान जी, आ0 आशुतोष जी, आ0 वेदिका जी और आ0 मीना पाठक जी .... आप सभी का धन्यवाद ... अपना आशीर्वचन बनाए रखें ... 

Comment by Meena Pathak on November 22, 2013 at 6:40pm

क्या बात है !! बहुत सुन्दर रचना , बधाई स्वीकारें 

Comment by वेदिका on November 22, 2013 at 6:29pm

कहते हैं विरह मे भी सुख है, सुखदायी स्मृतियाँ साथ हों तो जीवन सुखद हो जाता है! 

यादों से भरी गुनगुनी रचना पर बधाई !!

Comment by Dr Ashutosh Mishra on November 22, 2013 at 1:55pm

महसूस की जाने वाली बात ..बेहतरीन ..सादर बधाई के साथ 

Comment by Ayub Khan "BismiL" on November 21, 2013 at 10:14pm

bahut Achcha Janaab 

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