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नाव है, पतवार नहीं

भाव है, पर शब्द नहीं

शब्द साधे पर,

अभिव्यक्ति का

सलीका नहीं |

छंद का ज्ञान कर,

शिल्प को साध कर

कविता गढ़ दी

बार बार पढ़कर

पाया,

कविता में वह-

मधुर तान नहीं |

तब, कविता लिखा

कागद फाड़कर,

डालता रहा-

कूड़ेदान में,

कलम हाथ में पकडे

पकड़कर माथा,

गडा दी आँखे

घूरते कागजो के-

कूड़ेदान में |

फिर आहिस्ता से

सिर उठाया-

आसमान की बुलंदी देख

होंसला बढाया,

कलम को कागज पर

नाव की तरह चलाया |

शाम ढले

कलम को घिसते

खेत होती श्याही

थकती उँगलियों देख

जैसे ही हाथ हटाया-

एक विद्वजन कवि

का सामने आया |

उसका चेहरा पढ़ा,

चेहरे को पढ़कर

कर में, कलम थामकर

लिखने का मन

फिर बनाया,

पीछे से किसी ने

पीठ थपथपाई

बोले- डटें रहो,

प्रयास आपका

रंग ला रहा है |

(मौलिक व् अप्रकाशित) 

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Comment

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Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on October 28, 2013 at 7:19pm

रचना पसंद करने के लिए आपका हार्दिक आभार श्री गिरिराज भंडारी जी, एवं आ. मीना पाठक जी 

Comment by Meena Pathak on October 28, 2013 at 6:58pm

बहुत सुन्दर रचना आदरनीय सादर बधाई स्वीकारें 

Comment by राजेश 'मृदु' on October 28, 2013 at 3:24pm

जय हो आदरणीय, मन में घुमड़ते भाव को आपने करीने से बांधा है। हम सभी के साथ ऐसा ही होता है कभी जीवन में कभी कविता में । कभी जिंदगी डराती है कभी शब्‍द भाव चुराते हैं और हर बार कोई ना कोई हमारी पीठ थपथपा ही देता है । बहुत बढि़या प्रस्‍तुति, सादर


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on October 28, 2013 at 2:09pm

आदरणीय लक्ष्मण भाई , सुन्दर रचना , सच है प्रयास ही रंग लाताहै !!!! आपको बधाई !!!!!

कृपया ध्यान दे...

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