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दोहे : अरुन शर्मा 'अनन्त'

कोमल काया फूल सी, अति मनमोहक रूप ।
तेरे आगे चाँद भी, लगता मुझे कुरूप ।।

भोलापन अरु सादगी, नैना निश्छल झील ।
जो तेरा दीदार हो, धड़कन हो गतिशील ।।

गेसू लगते आपके, ज्यों रेशम की डोर ।
बिखरें काली रात हो, सुलझें होती भोर ।।

अधर पाँखुरी पुष्प से, कोमल गाल गुलाब ।
तुमको पाकर हो गया, पूरा दिल का ख्वाब ।।

ज्यों झूमर से घर सजा, त्यों झुमकें से कान ।
आभूषण ही लाज का, नारी का सम्मान ।।

खन खन खनके चूड़ियाँ, हरी गुलाबी लाल ।
मेरी हर इक चाह का, रखतीं सदा खयाल ।।

छम छम छम पायल बजे, लूटे चैन करार ।
ईश्वर से इतनी दुआ, अमिट रहे यह प्यार ।।

(मौलिक एवं अप्रकाशित)

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Comment

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सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on October 24, 2013 at 5:30pm

आदरणीय डॉ. आशुतोष, आपसे सादर निवेदन है कि टिप्पणी करने के क्रम में ऐसी बातें न लिख दिया करें जो मंच के उद्येश्यों पर ही कटाक्ष हो.  बात पाठक तक तो फेसबुक के माध्यम से भी पहुँचायी जा रही है. फिर इस मंच पर सुधीजनों को इतना समय देने, रचना की प्रस्तुतियों पर इतना मंथन करने और उसके अनुसार इतने गहन प्रयासों की आवाश्यकता ही क्या है ?

पुनः, यह मंच किसी ब्लॉगिया परिपाटी को नहीं मानता कि अच्छी-अच्छी बातें की जाय तो अन्य भी वापस अच्छी-अच्छी टिप्पणी किया करेंगे. मंच की अवधारणा के अनुसार,  यहाँ रचनाकार से कहीं अधिक महत्त्वपूर्ण रचनाकर्म और स्वयं रचना होती है. 

विश्वास है, आदरणीय, मैं अपनी बात सादर प्रस्तुत कर पाया.

शुभ-शुभ

Comment by Dr Ashutosh Mishra on October 24, 2013 at 4:17pm

अरुण जी ..पढ़कर आनंद आ गया ..दोहों के तकनीकी पक्ष के बारे में जानकारी नहीं है ..बात पाठक तक पहुचना चाहिए ..आपकी बात पहुची ..आपको तहे दिल बधाई के साथ 


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on October 24, 2013 at 2:03pm

बढिया दोहे हुए हैं, अरुण भाई. बधाई लें.
निम्नलिखित दोहे भाव, अर्थ और संप्रेषण की दृष्टि से पूरी तरह से संयत हैं -


गेसू लगते आपके, ज्यों रेशम की डोर ।
बिखरें काली रात हो, सुलझें होती भोर ।।

खन खन खनके चूड़ियाँ, हरी गुलाबी लाल ।
मेरी हर इक चाह का, रखतीं सदा खयाल ।।

छम छम छम पायल बजे, लूटे चैन करार ।
ईश्वर से इतनी दुआ, अमिट रहे यह प्यार ।।

बहुत-बहुत बधाई स्वीकारें.  
अन्य कई में तुकन्तता का आग्रह तथ्य पर ही भारी पड़ रहा है.


एक बात :

मैं आपके माध्यम से साझा करना चाहता हूँ कि छंदों में और के लिए अरु का प्रयोग वस्तुतः उस समय होता है, या होना चाहिये जब छंदों की भाषा में आंचलिक शब्दों की बहुतायत हो. और छंद का प्रारूप आंचलिक हो.
आपके दोहे की भाषा खड़ी या आधुनिक हिन्दी है. यहाँ और का द्विमात्रिक रूप औ’ साहित्यिक हिन्दी में पूरी तरह स्वीकृत है.
शुभ-शुभ

Comment by Meena Pathak on October 24, 2013 at 1:14pm
सभी दोहे एक से बढ़ कर एक | पढ़ के मन आनन्दित हुआ, बहुत बहुत बधाई स्वीकारें आदरणीय अरुण जी
Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on October 24, 2013 at 10:25am

नारी रूप की सुन्दरता का सजीव चित्रण करते दोहावली ने, मन मोह लिया आदरणीय अरुण जी, एक से बढकर एक दोहा..यह दोहे बहुत पसंदीदा हुए, बधाई स्वीकारें


ज्यों झूमर से घर सजा, त्यों झुमकें से कान ।
आभूषण ही लाज का, नारी का सम्मान ।।

खन खन खनके चूड़ियाँ, हरी गुलाबी लाल ।
मेरी हर इक चाह का, रखतीं सदा खयाल ।।

Comment by अरुन 'अनन्त' on October 24, 2013 at 10:15am

बहुत बहुत शुक्रिया आदरणीय गिरिराज सर स्नेह यूँ ही बना रहे

Comment by अरुन 'अनन्त' on October 24, 2013 at 10:14am

हार्दिक आभार रवि भाई

Comment by अरुन 'अनन्त' on October 24, 2013 at 10:13am

भाई अनुज राम बहुत बहुत धन्यवाद आपका

Comment by अरुन 'अनन्त' on October 24, 2013 at 10:13am

हार्दिक आभार आदरणीय अखिलेश सर स्नेह यूँ ही बना रहे

Comment by अरुन 'अनन्त' on October 24, 2013 at 10:12am

हार्दिक आभार आदरणीय रमेश जी

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