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एक बार फिर 

इकट्ठा हो रही वही ताकतें 

एक बार फिर 

सज रहे वैसे ही मंच 

एक बार फिर 

जुट रही भीड़

कुछ पा जाने की आस में

              भूखे-नंगों की 

एक बार फिर 

सुनाई दे रहीं,

वही ध्वंसात्मक  धुनें 

एक बार फिर 

गूँज रही फ़ौजी जूतों की थाप  

 

एक बार फिर 

थिरक रहे दंगाइयों, आतंकियों के पाँव 

एक बार फिर 

उठ रही लपटें

धुए से काला हो गया आकाश 

एक बार  फिर

गुम हुए जा रहे

शब्दकोष से अच्छे प्यारे शब्द 

एक बार फिर 

कवि निराश है, उदास है, हताश है...

(मौलिक अप्रकाशित) 

Views: 534

Comment

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Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on September 13, 2013 at 9:33am

बहुत ही सार्थक सन्देश देती रचना के लिए बधाई  श्री अब्वर भाई 

एक बार फिर 

आ गए आम चुनाव 

पांच साल के अंतराल से 

नेता आयेंगे घर घर 

घूमेंगे गली गली 

एक बार फिर 

बाटेंगे नोट  बंटेगी शराब 

ढाणी ढाणी गाँव गाँव 

Comment by बृजेश नीरज on September 12, 2013 at 11:24pm

वाह! बहुत खूब!


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on September 12, 2013 at 5:40pm

आदरणीय आपकी संवेदना पर क्या कहूँ !  ग़ज़ब !!

आपकी रचनाओं का कनवास ज़मीन पर फैला होता है और हम रचना को उस कैनवास पर मानों चल कर महसूसते हैं.

साहित्य का जो वास्तविक धर्म होता है उसे निभा ले जाने वाला रचनाकार आम आदमी के हृदय को छूता है.

वैसे इस बार थोड़ा और संयत होना था. शब्द विन्यास पर बात कर रहा हूँ.

भाव और संवेदना से पगी हुई आपकी इस उत्कृष्ट रचना को थोड़ा और कस रहा हूँ. विश्वास है आपका अनुमोदन मिलेगा -

एक बार फिर 

इकट्ठा हो रही हैं वही ताकतें 

एक बार फिर 

सज रहे हैं मंच 

एक बार फिर

जुट रही है भीड भूखे-नंगों की 

एक बार फिर 

सुनाई दे रहीं हैं ध्वंसात्मक धुनें 

एक बार फिर 

गूँज रही हैं फ़ौजी जूतों की थाप  

 

एक बार फिर

धमक रहे हैं दंगाइयों, आतंकियों के पाँव 

एक बार फिर 

उठने लगी हैं लपटें

धुँए से काला हो गया है आकाश.. एकबार फिर.

एक बार फिर गुम हुए जा रहे हैं

मनसकोश से अच्छे-प्यारे शब्द 

एक बार फिर 

कवि निराश है, उदास है, हताश है...

सादर

Comment by विजय मिश्र on September 12, 2013 at 5:14pm
अनवर भाई ! आजकी इन अनापेक्षित दुखदायी परिस्थितियों का कितना सजीव और भाव बिह्वल वर्णन किया है आपने , सही में अंतस चेतना को बेधनेवाली गलीज स्थितियां बेशर्म की तरह हम गैरतमन्दों के आगे खड़ी है .इस गीत में आपके मन की वेदना स्पष्ट उभरी है और मनोदशा को उजागर करती है . शुक्रिया .
Comment by MAHIMA SHREE on September 11, 2013 at 9:27pm

मर्मस्पर्शी .. संवेदनशील मनुष्य की विवशता मुखर हुयी है ...

Comment by अरुन 'अनन्त' on September 11, 2013 at 9:10pm

वाह बेहद गहन भाव पिरोये शानदार रचना आदरणीय बहुत बहुत बधाई स्वीकारें.


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on September 11, 2013 at 7:49pm

बाहरी बुरी ताकतों का, सामाजिक हालातों का  प्रभाव जिस तरह कवि के संवेदनशील हृदय पर होता है ..इसे संदरता से व्यक्त किया है 

सादर शुभकामनाएँ 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on September 11, 2013 at 7:11pm

आ0 अनवर भाई , हमेशा की तरह एक दमदार रचना !! बहुत बधाई !!

Comment by रविकर on September 11, 2013 at 11:12am

बहुत बढ़िया -
शुभकामनायें
आदरणीय-

नहा खून से हर हर गंगे |
बहा खून ले, दर दर दंगे |
भंग व्यवस्था लंगु प्रशासन
सड़कों पर दुर्दांत लफंगे ।

जब मारक आघात करें | बोलो किसकी बात करें ॥

जहाँ प्रवंचक प्रवचन करते ।
श्रोता मकु तरते ना तरते ।
लम्बी चौड़ी हांक हांक के
दारुण दुःख हरते ना हरते -

हरते सिया बलात धरें । बोलो किसकी बात करें ॥

Comment by annapurna bajpai on September 10, 2013 at 10:33pm
आ0 अनवर सुहेल जी बढ़िया रचना हेतु बधाई स्वीकारें ।

कृपया ध्यान दे...

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