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ग़ज़ल - कहकहों के दायरे में ..{अभिनव अरुण}

ग़ज़ल - 

कहकहों के दायरे में दिल मेरा वीरान है ,

गाँव के बाहर बहुत खामोश एक सीवान है |

 

उंगलियाँ उठने लगेंगी जब मेरे अशआर पर ,

मान लूँगा मैं कि मेरे दर्द का दीवान है |

 

वो सुनहरे ख्वाब में है सत्य से कोसो परे ,

आदमी हालात से वाकिफ मगर अनजान है |

 

छू के उस नाज़ुक बदन को खुशबुओं ने ये कहा ,

ज़िन्दगी से दूर साँसों की कहाँ पहचान है |

 

बढ़ रहा है कद अँधेरे का शहर में देखिये ,

हाशिये पर गाँव का दुबका हुआ अरमान है |

 

हाट एक सजती है पगडण्डी के दोनों छोर पर ,

और   इच्छाएं लिए   घुटता हुआ   इंसान है |

                             - अभिनव अरुण 

                               {19082013}

*सर्वथा मौलिक और अप्रकाशित 

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Comment by वेदिका on August 21, 2013 at 7:04pm

खूबसूरत ख्यालों से भरपूर आम आदमी के ख्याल शामिल की हुयी गजल  पर बधाई !!

Comment by पीयूष द्विवेदी भारत on August 21, 2013 at 6:56pm

बढ़िया  गज़ल, आदरणीय अभिनव जी ! बहुत बहुत बधाई !

हाँ, एक और बात कि जहाँ तक मै समझ पा रहा हूं अंतिम शेर के मिसरा-ए-ऊला में बहर थोड़ी बिगड़ रही है ! ये शायद गलती से, ध्यान न जाने के कारण हो गया है ! देखें..

हाट ए सजती है पगडण्डी के दोनों छोर पर....यहां २१२१ का क्रम हो रहा है ! एकबार दृष्टिपात करें और मुझे भी बताएं कि क्या मै सही हूं ?

Comment by Abhinav Arun on August 21, 2013 at 2:48pm

आदरणीया राजेश जी आपका आशीष मिला हार्दिक आभार आपका . श्री अरुण जी , श्री नीरज जी आप सदृश पारखियों को अश'आर भा गए मन उत्फुल्ल्लित है . हार्दिक रूप से धन्यवाद टिप्पणी के लिए .

Comment by अरुन 'अनन्त' on August 21, 2013 at 1:08pm

बेहतरीन लाजवाब ग़ज़ल आदरणीय भाई जी सभी के सभी अशआर भा गए दिल से बधाई स्वीकारें.


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on August 21, 2013 at 11:47am

उंगलियाँ उठने लगेंगी जब मेरे अशआर पर ,

मान लूँगा मैं कि मेरे दर्द का दीवान है |

 बेहतरीन लाजबाब अशआर वाह इस उम्दा ग़ज़ल के लिए ढेरों दाद कबूल करें |

Comment by Neeraj Nishchal on August 21, 2013 at 11:38am

वो सुनहरे ख्वाब में है सत्य से कोसो परे ,

आदमी हालात से वाकिफ मगर अनजान है |

छू के उस नाज़ुक बदन को खुशबुओं ने ये कहा ,

ज़िन्दगी से दूर साँसों की कहाँ पहचान है |

बहुत ही ज्यादा आदरणीय अरुण भाई

Comment by Abhinav Arun on August 21, 2013 at 7:11am

आ. जितेन्द्र जी बहुत आभार आपको ग़ज़ल पसंद आई लेखन सार्थक हुआ !

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on August 21, 2013 at 3:17am

वो सुनहरे ख्वाब में है सत्य से कोसो परे ,

आदमी हालात से वाकिफ मगर अनजान है |.........वाह! बड़ी मासूमियत लिया हुआ शेर

सुंदर भावों से सुसज्जित गजल पर, दिली दाद कुबुलिये आदरणीय अभिनव अरुण जी

Comment by Abhinav Arun on August 20, 2013 at 7:48pm

मेरी सीधी सादी ग़ज़ल ने आपका स्नेह पाया ..आभार आदरणीय शिज्जू जी बहुत बुत आशीष मिलता रहे कला फलती फूलती रहे !!


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on August 20, 2013 at 7:13pm

एक सीधे साधे आम इंसान की सोच आपकी इस ग़ज़ल में उभर के आई है, इस सशक्त रचना के लिये बधाई कुबूल करें

कृपया ध्यान दे...

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