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घटाएँ काली-काली हैं

शायद बरसने वाली हैं

वन उपवन हैं प्यासे कब से

तरस रहे हैं पानी बरसे

खेतों और खलिहानों को

मजदूर और किसानों को

आस जगी है अब तो बरसें

बरसों बीत गए हैं बरसे

बरसे तो सबका मन हर्षे

तपन मिटे इस धरती की

हरियाली की चादर फैले

मोर पपीहों का दिल बहले

नाचे लोग घर उपवन में

नव जीवन का संचार हो मन मे

खिलें फूल मुस्काए हर मन

उमड़-घुमड़ कर बरसो घन

मौलिक व अप्रकाशित

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Comment

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Comment by Dr Ashutosh Mishra on June 20, 2013 at 2:59pm

सुंदर कृति ..

Comment by बृजेश नीरज on June 19, 2013 at 11:03pm

इस सुंदर रचना पर मेरी बधाई स्वीकारें!

Comment by ram shiromani pathak on June 19, 2013 at 9:59pm

 सुन्दर रचना ...बधाई 

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on June 18, 2013 at 4:20pm
आदरणीया...सुंदर रचना अभिव्यक्ति..."हार्दिक शुभकामनाऐं "
Comment by Sumit Naithani on June 18, 2013 at 4:17pm

aapki pukar pe barsh hi gaye,....sunder prstuti

Comment by Pragya Srivastava on June 18, 2013 at 3:47pm

डी. पी माथुर जी,

                    धन्यवाद

Comment by Pragya Srivastava on June 18, 2013 at 3:45pm

केवल जी......................................धन्यवाद

Comment by Pragya Srivastava on June 18, 2013 at 3:44pm

शुक्रिया अमन जी

Comment by Pragya Srivastava on June 18, 2013 at 3:41pm

श्याम नारायण वर्मा जी............................................धन्यवाद

Comment by Pragya Srivastava on June 18, 2013 at 3:38pm

मीना पाठक जी,.........................शुक्रिया

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