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दुःख सहने के अभ्यस्त

उनके जीवन में है दुःख ही दुःख

और हम बड़ी आसानी से कह देते

उनको दुःख सहने की आदत है...

वे सुनते अभाव का महा-आख्यान

वे गाते अपूरित आकांक्षाओं के गान

चुपचाप सहते जाते जुल्मो-सितम

और हम बड़ी आसानी से कह देते

अपने जीवन से ये कितने सतुष्ट हैं...

वे नही जानते कि उनकी बेहतरी लिए

उनकी शिक्षा, स्वास्थय और उन्नति के लिए

कितने चिंतित हैं हम और

सरकारी,  गैर-सरकारी संगठन 

दुनिया भर में हो रहा है अध्ययन

की जा रही हैं पार-देशीय यात्राएं

हो रहे हैं सेमीनार, संगोष्ठिया...

वे नही जान पायेंगे कि उन्हें

मुख्यधारा में लाने के लिए

तथाकथित तौर पर सभ्य बनाने के लिए

कर चुके हजम हम

कितने बिलियन डालर

और एक डालर की कीमत

आज पचपन रुपये  है...!

                                            (मौलिक अप्रकाशित और अप्रसारित रचना ) अनवर सुहैल

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Comment

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Comment by anwar suhail on July 4, 2013 at 9:21pm

आप सभी का आभार व्यक्त करता हूँ कि आपने मेरी कविता के मर्म को बूझकर मुझे सतत सृजन-रत रहने के लिए प्रेरित किया है


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on July 3, 2013 at 10:31pm

जिस गंभीरता से यह रचना व्यंग्य करती है उसका कोई पारावार नहीं है.

जिस दुखद सच्चाई की ओर यह इंगित करती है वह विकास के नाम पर अपनाये गये काइंयाँपन को उजागर करती है. 

जिनके लिए जो कुछ हो रहा है उन्हीं को नहीं मालूम कि वे बिम्ब हैं ! और जो ये सब कर रहे हैं उनको मालूम है कि यह बिम्ब ही उनका ज़रिया है. इस ज़रिये को कौन हाथ से जाने देगा भला ? तभी तो रचना में उद्धृत डॉलर के मूल्य में तेज़ी से इज़ाफ़ा हुआ, ताकि उगाही के रुपयों में मूल्य दिखे तो सनद रहे.. .

इस प्रखर सोच को शब्द देने के लिए आपको हार्दिक बधाई अनवर सुहैलजी.. .

सादर

Comment by वेदिका on June 20, 2013 at 9:24pm

तथाकथित तौर पर सभ्य बनाने के लिए

कर चुके हजम हम

कितने बिलियन डालर

और एक डालर की कीमत

आज पचपन रुपये  है...! ..........नितांत सत्य 

 आपको हार्दिक बधाई!! 

Comment by Dr Ashutosh Mishra on June 20, 2013 at 2:55pm

आदरनीय अनवर जी ...इस बेहद संजीदगी से लिखी रचना जो यथार्थ के धरातल पर बिलकुल खरी उतरती है के लिए आपको हार्दिक बधाई 

Comment by बृजेश नीरज on June 19, 2013 at 11:07pm

वाह! और उस पचपन रूपए में नेताओं के हिसाब से ऐसे लोग डेढ़ दिन का खाना खा सकते हैं। कितना खाना हजम कर गए। हाजमोला लेते होंगे हर कौर के बाद!
मेरी हार्दिक बधाई ऐसी सुंदर रचना के लिए!

Comment by ram shiromani pathak on June 19, 2013 at 9:52pm

आदरणीय  अनवर जी,  बहुत ही सुन्दर रचना  //हार्दिक  बधाई//सादर 

Comment by विजय मिश्र on June 19, 2013 at 11:57am
अनवर भाई !
फिर आपने अपनी कलम से एक जलता हुआ सवाल हमारे सामने उछाल दिया और उसके लपट में झुलसते और सरकारी -गैरसरकारी योजनाओं से महरूम उसके असली हकदार गरीब-गुरूवा की जमीनी सच्चाई भी रखी और यह भी कि आज का समुन्नत और प्रगतिशील सक्षम समाज कितनी सहजता से अपनी ओछी दृष्टि से इन्हें अनदेखा करता है ? शुक्रिया .
Comment by coontee mukerji on June 18, 2013 at 12:55pm

वे नही जानते कि उनकी बेहतरी लिए

उनकी शिक्षा, स्वास्थय और उन्नति के लिए

कितने चिंतित हैं हम और

सरकारी,  गैर-सरकारी संगठन 

दुनिया भर में हो रहा है अध्ययन

की जा रही हैं पार-देशीय यात्राएं

हो रहे हैं सेमीनार, संगोष्ठिया...

वे नही जान पायेंगे कि उन्हें

मुख्यधारा में लाने के लिए

तथाकथित तौर पर सभ्य बनाने के लिए

कर चुके हजम हम

कितने बिलियन डालर

और एक डालर की कीमत

आज पचपन रुपये  है...!

................सच्चाई बयां  करते हुए क्या व्यंग्य मारा है अनवर जी .यह सच है कि एक गरीब आदमी को रूखी सूखी रोटी खाते हुए देख हम कितने आसानी से कह देते हैं कि वह कितना सुखी है ......लेकिन कोई तो उन से पूछे...? सादर / कुंती

Comment by Shyam Narain Verma on June 18, 2013 at 12:49pm
आदरणीय ,

 

बहुत ही समसामयिक और शानदार प्रस्तुति।   हार्दिक बधाई स्वीकारें।  

Comment by aman kumar on June 18, 2013 at 11:27am

शानदार प्रस्तुति।   हार्दिक बधाई स्वीकारें।  सादर,

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