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प्रेम का कड़वा अनुभव ( घनाक्षरी छंद )

बन गया हूँ भिखारी ,लगी थी प्रेम बीमारी !
थोड़ी दया दिखाकर ,मुझको बचाइये !
मुझको ऐसा निचोड़ा ,अब कहीं का ना छोड़ा !
जान बच जाय ऐसी ,युक्ति तो बताइए !!


माना गलती हो गयी ,थोड़ी देर कर गया !
बालक समझकर ,कष्ट से उबारिये !
कान पकड़कर अब ,माफ़ी मांगता हूँ भाई !
दुर्दशा को देखकर ,हंसी ना उड़ाइए !

राम शिरोमणि पाठक "दीपक"
मौलिक/अप्रकाशित

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Comment by SANDEEP KUMAR PATEL on May 16, 2013 at 3:16pm

सुंदर प्रयास है भाई साहब किंतु आदरणीय अशोक सर के कहे से सहमत हूँ
गेयता कुछ बाधित है प्रयासरत रहिए
बधाई हो इस सृजन हेतु

Comment by ram shiromani pathak on May 16, 2013 at 2:01pm

आदरणीय अशोक सर आगे से ध्यान दूंगा //हार्दिक आभार

Comment by Ashok Kumar Raktale on May 15, 2013 at 10:18pm

भाई राम शिरोमणि जी घनाक्षरी पर सुन्दर प्रयास हुआ है, बहुत बहुत बधाई स्वीकारें, किन्तु मित्र गेयता बहुत बाधित लग रही है. 

Comment by केवल प्रसाद 'सत्यम' on May 14, 2013 at 10:20pm

आ0 राम शिरोमणि जी,  प्रिय मित्र, सुन्दर हास्य पुट हार्दिक बधाई स्वीकारें,   सादर,

Comment by ram shiromani pathak on May 14, 2013 at 3:54pm

आदरणीय भाई राजेश  जी हार्दिक आभार  \\\\सादर  

Comment by ram shiromani pathak on May 14, 2013 at 3:54pm

आदरणीय प्रदीप जी हार्दिक आभार  \\\\सादर  

Comment by ram shiromani pathak on May 14, 2013 at 3:53pm

आदरणीया कुंती जी अपने उचित ही कहा है ,लेकिन ये मेरी समस्या नहीं थी मेरे एक मित्र है ,वो अपनी कथा सुना रहे थे! बस उसी पर मैंने चार लाइन लिख दिया \\\\सादर  

Comment by राजेश 'मृदु' on May 14, 2013 at 3:31pm

चलिए कम से कम आपने गलती तो मान ही ली, तो बधाई भी लीजिए इस घनाक्षरी पर

Comment by PRADEEP KUMAR SINGH KUSHWAHA on May 14, 2013 at 1:31pm

अब तो माफ करना ही पड़ेगा 

दीपक जी 

सस्नेह बधाई 

Comment by coontee mukerji on May 14, 2013 at 10:57am

प्रेम हो जाना या प्रेम करना कोई बुरी बात नहीं , प्रेम में दिमागी संतुलन खोना बुरी बात है , जो कोई ज़मीन पर पैर टिकाकर प्रेम से मुखातिब होता है  वहीं  जिंदगी में सफ़ल होता . प्रेम की राह में छोटी बड़ी बाधाएँ बहुत आती है.जीवन बहुत सुंदर है अगर एक राह बंद होती है तो दुसरी राह निकल ही आती है.......आत्मग्लानी त्याग कर भैया कदम आगे बढ़ाइये./ सादर / कुंती .

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