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सुनो स्त्री !

सुनो स्त्री !

पुरुष स्पर्श की भाषा सुनो !

और तुम देखोगी आत्मा को देह बनते !

 

तेज हुई सांसों की लय पर थिरकती छातियाँ

प्रेम कहेंगी तुमसे -

संगीत और नृत्य के संतुलन को !

सामंजस्य जीवन कहलाता है !

(ये तुम्हे स्वतः ज्ञात होगा)

सम्मोहन टूटते है अक्सर -

बर्तन फेकने की आवाजों से !

 

आँगन और छत के लिए आयातित धुप

पसार दी जाती है ,

शयनकक्ष की मेज पर !

रंगीन मेजपोश आत्ममुग्धता का कारण हो सकते है ,

जब बुझ जाएगा तुम्हारी आँखों का सूरज !

(अगर डूबता तो फिर उग भी सकता था)

 

थोपी गई धार्मिक स्मृतियाँ विस्मृत कर देतीं हैं -

प्रतिरोध की आदिम कला !

इस घटना को आस्तिक होना कहा जाएगा !

 

तो सुनो स्त्री !

पुरुष स्पर्श की भाषा सुनो !

बस , ह्रदय कर्ज़दार न हो
तुम्हारे कान गिरवी न रख दिए जाएँ !
(होंठ उम्र भर सूद चुकाते रहेंगे )

दूब ताकतवर मानी गई है ,

कुचलने वाले भारी भरकम पैरों से !

बीच समुन्दर ,

अकेला जहाज ,

मस्तूल पर तुम !

तुम्हारे पंख सजावट का सामान नहीं हैं !

थोपी गई स्मृतियाँ नकार दी जानी चाहिए !

 

 

 

……………………………...….. अरुन श्री !

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Comment

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Comment by Arun Sri on May 5, 2013 at 1:36pm

विजय मिश्र सर , हार्दिक धन्यवाद !

Comment by Ashok Kumar Raktale on May 5, 2013 at 1:26pm

बहुत सुन्दर ओज के भाव स्त्री मन में ऊर्जा भरती सुन्दर रचना के लिए बहुत बहुत बधाई स्वीकारें भाई अरुण जी.

Comment by बृजेश नीरज on May 5, 2013 at 12:04am

आपकी रचना की प्रशंसा में इससे बड़ी कविता तैयार हो जाएगी इसलिए मेरी बधाई स्वीकार कर लें।

एक बात आपसे पूछना चाहता था ‘धुप’ का आशय क्या है?

Comment by seema agrawal on May 4, 2013 at 11:44pm

 पुरुष स्पर्श की भाषा सुनो !
और तुम देखोगी आत्मा को देह बनते !......बेहद संवेदनशील और कचोटता हुआ स्वर 

सामंजस्य जीवन कहलाता है !.......वाह 

सम्मोहन टूटते है अक्सर -
बर्तन फेकने की आवाजों से !...सच में लगा कोई सम्मोहन टूटा 

थोपी गई धार्मिक स्मृतियाँ विस्मृत कर देतीं हैं -
प्रतिरोध की आदिम कला !
इस घटना को आस्तिक होना कहा जाएगा ! ..........hmmmm बात तो 100% सही है धार्मिक स्मृतियाँ ही अधार्मिकता का कारण हैं (व्यक्तिगत विचार है ये बस )

तो सुनो स्त्री !
पुरुष स्पर्श की भाषा सुनो !
बस तुम्हारे कान कर्जदार न हों !
(होंठ चुकाते रहेंगे उम्र भर)
दूब ताकतवर मानी गई है ,
कुचलने वाले भारी भरकम पैरों से ! 
बीच समुन्दर ,
अकेला जहाज ,
मस्तूल पर तुम !
तुम्हारे पंख सजावट का सामान नहीं हैं !
थोपी गई स्मृतियाँ नकार दी जानी चाहिए ! ....रचना का समापन एक ऐसे अंदाज़ में और वो भी एक पुरुष की कविता में ...निशब्द हूँ आपके विचारों को पढ़ कर ....ढेरों आशीष इस रचना के लिए


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on May 3, 2013 at 9:41pm

सचाई क्या है  और, चाहिये क्या के मध्य के विचार को तार्किकता का आवरण दे, बहुत कुछ सार्थक कहा गया है.

रचना की पहली तीन पंक्तियाँ ही प्रकृति के अत्यंत जटिल व्यवहार को हठात् नंगा कर देती हैं. भावनाओं की सूक्ष्मता उन्माद के स्थूल व्यवहार के ह्त्थे चढ़ती कितनी निरीह होती जीती रही है !

एक व्यथित संवेदना को शब्दों में साकार करने की चेष्टा के लिए अतिशय बधाइयाँ.

Comment by केवल प्रसाद 'सत्यम' on May 3, 2013 at 9:08pm

आ0 अरून श्री जी, ’’तुम्हारे पंख सजावट का सामान नहीं हैं !
थोपी गई स्मृतियाँ नकार दी जानी चाहिए !’’ अतिसुन्दर रचना। बधाई स्वीकारें। सादर,

Comment by coontee mukerji on May 3, 2013 at 8:54pm

भैया ,जहाँ स्त्री पक्ष की बातें होती है वहाँ स्वतः ही कोमलता पनपने लगती खासकर कविता में......

सुनो स्त्री !

पुरुष स्पर्श की भाषा सुनो !

और तुम देखोगी आत्मा को देह बनते !...........जैसे पत्थर पर पत्थर के फूल उगाने की कोशिश की जा रही हो......खैर  अपनी अपनी

मान्यता ./ सादर / कुंती .

Comment by Arun Sri on May 3, 2013 at 8:51pm

हार्दिक धन्यवाद प्रदीप कुशवाहा सर ! सादर !

Comment by anwar suhail on May 3, 2013 at 7:40pm

बहुत दिनों बाद एक अच्छी कविता पढ़ी...बधाई भाई

Comment by विजय मिश्र on May 3, 2013 at 6:39pm
बहुत सुंदर

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