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जूनून -ए-इश्क में आबाद, ना बर्बाद हो पाए मुहब्बत में तुम्हारी कैद ना ,आज़ाद हो पाए

दोस्तों एक गजल लिखने की कोशिश की है अपने कुछ मित्रों के सहयोग से आशा है आप लोग अवलोकित करके मुझे मार्गदर्शित करेंगे |
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जूनून -ए-इश्क में आबाद, ना बर्बाद हो पाए 
मुहब्बत में तुम्हारी कैद ना ,आज़ाद हो पाए ||

कहानी तो हमारी भी बहुत ,मशहूर थी लेकिन 
जुदा होकर न तुम शीरी न हम, फरहाद हो पाए ||

न कुछ तुमने छुपाया था ,न कुछ हमने छुपाया था 
न तुम हमदर्द बन पाए ना ,हम हमराज हो पाए ||

जुदाई के लिए हम तुम बराबर हैं वजह हमदम 
जिरह तुम भी न कर पाए न हम जांबाज हो पाए ||

ग़लतफहमी हमारे दरमियाँ, बेवजह थी लेकिन 
न तुम आये मनाने को ,न हम नाराज हो पाए ||

गुरूर -ए-हुश्न में तुम थे, गुरूर-ए-इश्क में हम थे 
न हम नाचीज कह पाए, न तुम नायाब हो पाए ||

अभी भी याद आती है, नजर की वो खता पहली 
न तुम नजरे झुका पाए, न हम आदाब कह पाए ||

जूनून -ए-इश्क में आबाद, ना बर्बाद हो पाए 
मुहब्बत में तुम्हारी कैद, ना आज़ाद हो पाए ||................ manoj 
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Comment

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Comment by अरुन 'अनन्त' on March 1, 2013 at 11:37am

मित्रवर प्रयास हेतु आपको हार्दिक बधाई ग़ज़ल के नियमों की जानकारी के बगैर आप ऐसा लिख सकते हैं तो जानकारी होने पर आप कहर बरसा देंगे. ग़ज़ल का ज्ञान अर्जित करें सादर

Comment by mrs manjari pandey on February 28, 2013 at 11:10pm

मनोज जी  लिख रहे हैं यूँ ही लिखते जाइये।बधाई।

Comment by SALIM RAZA REWA on February 28, 2013 at 7:31pm

 जूनून -ए-इश्क में आबाद, ना बर्बाद हो पाए 
मुहब्बत में तुम्हारी कैद ना ,आज़ाद हो पाए ||

अभी भी याद आती है, नजर की वो खता पहली 
न तुम नजरे झुका पाए, न हम आदाब कह पाए ||

 

dost dono sher ki kafiaa alag hai aapne agar rdeef kafiya nahi nibhaya to gazal nahi hui ....aap bhut hi umada sait se jude hai jahan aap gazal khna  seekh sakte hai//

Comment by डॉ. सूर्या बाली "सूरज" on February 26, 2013 at 11:59pm

बहुत ही अच्छी कोशिश और फिक्र!  केवल थोड़ी ग़ज़ल शिल्प की जानकारी हासिल कर लें...मुझे यकीन है की आने वाले दिनों में इस मंच को एक बेहतरीन ग़ज़लकार मिलने वाला है....बहुत बहुत मुबारकबाद ।

Comment by रविकर on February 26, 2013 at 8:36am

बहुत खूब-
बधाई आदरणीय ||

Comment by Manoj Nautiyal on February 26, 2013 at 7:57am

सभी सम्मानित सुधि जानो का हार्दिक अभिनन्दन एवं धन्यवाद | मै आप सभी के सुझाओं का सम्मान करते हुए अगले प्रयास में आपको इससे भी बेहतर कर के दिखाऊंगा यह मेरी कोशिश रहेगी मान्यवर | 

Comment by वीनस केसरी on February 26, 2013 at 12:21am

अच्छी कोशिश हुई है
ऐसी ही कुछ और कोशिशें से शिल्प और कहन में और समरसता आयेगी

अभी के लिए ढेरो बधाई

कुछ आधारभूत बातों पर ध्यान दीजिए
जानकारी यत्र तत्र फ़ैली है, समेत सकेंगे तो फ़ाइदे में रहेंगे 
शुभकामनाएं


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on February 25, 2013 at 11:47pm

भाव और कथ्य से भली लेकिन शिल्प के लिए विशेष मशक्कत चाहती इस प्रस्तुति हेतु शुभकामनाएँ. ..

आपका प्रयास ग़ज़ल की कक्षा के पाठों से और निखरेगा.

शुभेच्छाएँ.

Comment by विन्ध्येश्वरी प्रसाद त्रिपाठी on February 25, 2013 at 11:36pm
अनुमोदन के लिये दाद आभार आदरणीया राजेश जी!

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on February 25, 2013 at 10:54pm

मनोज जी बहुत  खूबसूरत ग़ज़ल का प्रयास किया है  विंध्येश्वरि जी सही कह रहे हैं ग़ज़ल के नियमों में इसे बांधेंगे तो ये और निखर जायेगी बहर हाल  दाद कबूल कीजिये  

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