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दामिनी बोली मै तो जाती हूँ -
पर तुम सब मेरी बात सुनो,  
खुद ही लाज बचालो अपनी, 
चीर हरण अब मत होने दो ।
द्वापर नहीं यह कलियुग हैं,
इसमें कृष्ण नहीं आपायेंगे ।
बिन गोवन्द के देखो, 
अर्जुन भी क्या कर पायेंगे ।
कोरे आश्वासन ध्रतराष्ट्र के, 
धर्मराज सिर झुका,मौन हुए,
भीष्म पितामह पश्चाताप मे,
जलते रहने को मजबूर हुए ।
दुर्योधन की फटकारविदुर को, 
शकुनि अब सलाहकारहुए ।
 
कहे दामिनी मै तो जाती हूँ,
पर तुम सब कृष्ण उवाच सुनो ।  
खुद की लाज बचाने खातिर -
अपने कर में हिम्मत करके,
खुद को शाश्त्र उठाना होगा ।
अपनी अस्मत बचाना है तो,
अब लक्ष्मीबाई बनना होगा ।
न्याय की देवी को मत देखो,
पुरुष प्रधान इस जग में वह तो- 
रहती आँखों पर पट्टी बाँधे ।
जहां बने कानून वहां तो- 
बैठे वे,जो नित जनता को रांधे ।
सज्जनता को चोला ओढ़े,
लूट खाते सबकुछ बिना डकारे ।
इन अश्रुओ को अबेर कर रखो,
अब और अधिक मत बहने दो ।
खुद ही लाज बचालो अपनी, 
चीर हरण अब मत होने दो ।
 
अपने को अबला मत समझो, 
सबला बन अपना हित समझो ।
अर्जुन सा पाठ पढ़ गीता में-
विजयी शास्त्र अब कर में पकड़ों,
मित्र, बंधू और रिश्ते नाते-
सम्बंधों में इतना मत जकड़ो ।
अपने कर में हिम्मते करके-
खुद को शश्त्र उठाना होगा ।
कहे दामिनी मै जाती हूँ-
पर तुम गीता के कृष्ण उवाच सुनो 
खुद ही लाज बचालो अपनी, 
चीर हरण अब मत होने दो ।
 
-लक्ष्मण प्रसाद लड़ीवाला 

 

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Comment by Ashok Kumar Raktale on January 1, 2013 at 9:47pm
खुद ही लाज बचालो अपनी, 
चीर हरण अब मत होने दो ।
जागरूकता को बढाने का संदेश देती सुन्दर रचना पर बधाई और नव वर्ष पर हार्दिक शुभकामनाएं आदरणीय लड़ीवाला साहब जी सादर.
Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on January 1, 2013 at 7:16pm

रचना पसंद कर इस अति संवेदनशील मसले पर सहभागिता के लिए हार्दिक आभार 

नुतन वर्ष पर हार्दिक मंगल कामनाए 
Comment by SANDEEP KUMAR PATEL on January 1, 2013 at 4:33pm

संवेदना से लिपटी सुन्दर भावाभिव्क्ति सर जी सादर प्रणाम सहित ढेरों बधाइयां
और नव वर्ष की शुभकामनाएं

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