ढोल- नगाड़े
हाथी- घोड़े
आतिशबाजी
इतने रंग
सब हैं संग
कभी पालकी लिए
कभी रणभूमि
कभी रंगभूमि
चले जा रहे हैं
भागे जा रहे हैं
सींचे जा रहे हैं
शीतल जल
क्या कोई घड़ा है
इनके हाथों में
अहा ये क्या
ये घोर निनाद कैसा
अग्नि बाण है
या आतिशबाजी ही है
ढोल-नगाड़े
तीव्र ध्वनी से
और तीव्र
मानो महाभारत हो रहा हो
शीतल फुहारों से
फिर जल सिंचन क्यूँ
क्या ये भी बाण है
वर्षा बाण
ये कैसी स्वर लहरी है
अहा
वाह
निनाद थमा
आतिशबाजी भी रुक गयी
स्वर लहरी भी समाप्त हुई
जल सिंचन भी रुक गया
और ये क्या
लज्जा लिए
कौन झांक रहा है
घूँघट कौन उठा रहा है
सहमी सी
सकुचाई सी
निश्छल सी मुस्काई सी
ये तो सूरज की
चंचल किरण है
जो झांक रही है
बादलों की ओट से
संदीप पटेल "दीप"
Comment

और ये क्या
लज्जा लिए
कौन झांक रहा है
घूँघट कौन उठा रहा है
सहमी सी
सकुचाई सी
निश्छल सी मुस्काई सी
ये तो सूरज की
चंचल किरण है
जो झांक रही है
बादलों की ओट से बहुत प्यारा बिम्ब लिया है रचना में बहुत खूब
आदरणीय सदीप जी
Comment by SURENDRA KUMAR SHUKLA BHRAMAR on July 14, 2012 at 10:57pm और ये क्या
लज्जा लिए
कौन झांक रहा है
घूँघट कौन उठा रहा है
सहमी सी
सकुचाई सी
निश्छल सी मुस्काई सी
ये तो सूरज की
चंचल किरण है
जो झांक रही है
बादलों की ओट से
प्रिय संदीप 'दीप' जी ..प्रकृति नटी है हर रंग समाया है सरमाया है ...दुल्हन सी खूबसूरत आँख मिचौली ....
http://www.surendrashuklabhramar.blogspot.in/2012/05/blog-post_23.html
Comment by Albela Khatri on July 14, 2012 at 12:05pm भाई वाह वाह
संदीप पटेल जी,वाह !
निनाद थमा
आतिशबाजी भी रुक गयी
स्वर लहरी भी समाप्त हुई
जल सिंचन भी रुक गया
और ये क्या
लज्जा लिए
कौन झांक रहा है
घूँघट कौन उठा रहा है
सहमी सी
सकुचाई सी
निश्छल सी मुस्काई सी
ये तो सूरज की
चंचल किरण है
जो झांक रही है
बादलों की ओट से
____क्या अन्दाज़ है..........बलिहारी इस अनुपम काव्य चित्र पर
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