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लघु कथा :- गिद्ध

"चल कल्लुआ जल्दी से दारु पिला, आज बहुत टेंसन में हूँ |"
"अरे, टेंसन और आप? आखिर ऐसी क्या बात हो गई बिल्लू दादा ? 
"यार, कल शाम जिस बूढ़े को हमने लूटा था न, उसने थाने में रपट दर्ज करा दी है |"
"तो दादा इसमें कौन सी टेंसन की बात है ?"
"टेंसन ये है कि हम ने तो कुल २१२ रुपये और एक पुरानी सी घड़ी ही लूटी थी, लेकिन उस बुढऊ ने दस हजार नगद, एक घड़ी और सोने की अंगूठी की रपट लिखवा दी है |"
"रपट लिखवा दी तो कौन सा आसमान टूट पड़ा ?" 
"आसमान ये टूट पड़ा है कल्लुआ कि अब ऊ ससुरा दरोगा, लूट में से आधा हिस्सा मांग रहा है |"

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Comment by CA (Dr.)SHAILENDRA SINGH 'MRIDU' on April 30, 2012 at 12:30pm

अपने नाम से ही परिलक्षित होती लघु कथा में वाकई यथार्थ सत्य दिखाई पड़ा , आपकी  सन्देश परक लघुकथा पर हार्दिक बधाई स्वीकार करें सर

Comment by Abhinav Arun on April 27, 2012 at 11:23am

बहुत बढ़िया !! कितनी सादगी से लघुकथा का हक़ अदा कर दिया और बात भी कह दी !! बधाई श्री बागी जी !!

Comment by PRADEEP KUMAR SINGH KUSHWAHA on April 26, 2012 at 2:57pm

आदरणीय बागी जी, सादर. 

मुझे सीखने  को मिल रहा है.  मैंने भी १० लाइन की रचना पोस्ट की थी . मार्गदर्शन नहीं मिला. आपकी लघु कथा मेरे लेखन हेतु मार्ग दर्शक hogi. बधाई. 

प्रधान संपादक
Comment by योगराज प्रभाकर on April 26, 2012 at 12:21pm

अपने नाम को सार्थक करती हुई बहुत ही सुंदर लघुकथा कही है बागी जी. कहानी में २ गिद्ध तो वो चोर हैं, तीसरा गिद्ध है हिस्सखोर दरोगा, और मज़े की बात तो ये है कि लुटने वाले बूढे में भी कहीं न कहीं गिद्धवृत्ति दिखाई दे रही है. दरअसल, अपने आसपास से छोटे छोटे लम्हे चुराकर थोड़े से शब्दों में बात कह देने का नाम ही लघुकथा है. आपकी लघुकथा भी बिल्कुल वैसे ही है. केवल वार्तालाप के माद्यम से आपने अपनी बात को बड़े कसे हुए अंदाज़ में कहा है, जिसकी जितनी प्रशंसा की जाए कम है. मेरी हार्दिक बधाई स्वीकार करें भाई बागी जी.      

Comment by AVINASH S BAGDE on April 26, 2012 at 10:31am

aadarniy Bagi ji,

bahut hi jabardast prahar karti ye rachana aaj ki vyawastha pe.

jitani bhi tarif ki jaye kam hai

sateek sanket....sadhuwad.


मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on April 26, 2012 at 10:10am

आदरणीय सौरभ भईया , लघु कथा को सराहने हेतु बहुत बहुत आभार |

Comment by Er. Ambarish Srivastava on April 26, 2012 at 1:54am

 आदरणीय मित्र बागी जी ! आपकी यह लघुकथा मात्र लघुकथा ही नहीं बल्कि आज के समाज की विद्रूपताओं  का सटीक चित्रण कर रही है ! साधुवाद मित्रवर !

Comment by आशीष यादव on April 25, 2012 at 11:50pm

waah bagi ji, kitni khubsurti aapne samaaj ki bauraai ko dikha diya. chand samwaado se bta diya ki chor aur police mausere bhai hai.
yah laghukatha bahut pasand aayi.

Comment by वीनस केसरी on April 25, 2012 at 11:36pm

बिल्लू दादा से कहिये नवरत्न का तेल लगाए काहे कि इ तेल में है जड़ी बूटी जो टेंसन कर दे रफू चक्कर :))))

लघुकथा पसंद आई ... बधाई
नाम भी बहुत सोच कर रखा है .... नाम के लिए डबल बधाई


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on April 25, 2012 at 9:51pm

जिस सच्चाई को मकान की दीवारें जानती हैं उस सच्चाई को खुद मकान बोला नहीं करते, बस चुपचाप जीते हैं.

इसी भूमि की संस्कृति और अक्षुण्ण संस्कार की उपज ईशावास्य उपनिषद् की अमरवाणी लाख कहती रहे - मा गृद्धः कस्य स्विद्धनम् ..  यानि, (इस चराचर जगत में उपलब्ध वस्तुओं पर) कभी भी गिद्ध दृष्टि नहीं रखनी चाहिये.    परन्तु, इसी भूमि की संततियाँ क्या जीवन जीने को अभिशप्त हैं !?

भाई बाग़ी जी, आपकी इस लघुकथा में प्रयुक्त आम भाषा और संवाद-शैली जान है. जैसा तथ्य, वैसा कथ्य, जिसे पढ़ कर मन फिलहाल चुपचाप है. 

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