For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

ग़ज़ल - चली आयी है मिलने फिर किधर से ( गिरिराज भंडारी )

चली आयी है मिलने फिर किधर से

१२२२   १२२२    १२२

जो बच्चे दूर हैं माँ –बाप – घर से

वो पत्ते गिर चुके समझो, शज़र से

 

शिखर पर जो मिला तनहा मिला है

मरासिम हो अहम, तो बच शिखर से

 

रसोई  में  मिला  वो स्वाद  आख़िर

गुमा था जो किचन में  उम्र  भर से  

 

तू बाहर बन सँवर के आये जितना

मैं भीतर झाँक सकता हूँ , नज़र से

 

छिपी  है ज़िंदगी  में  मौत  हरदम

वो छू  लेगी  अगर  भागेगा डर से

 

खुशी बेनाम है, ज़िद्दी है, बस वो

चली आयी है मिलने फिर किधर से

 

लिये  कश्कोल अब  वो  घूमता  है

गदा खाली  न  भेजा जिसने दर से

 

तू चाहे चल, घिसट या  दौड़ता  रह

नहीं मुमकिन अलग  होना सफ़र से   

********************************** 

औलिक एवं अप्रकाशित 

Views: 211

Comment

You need to be a member of Open Books Online to add comments!

Join Open Books Online


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on September 7, 2025 at 6:27pm

आदरणीय सौरभ भाई , ग़ज़ल  के शेर पर आपकी विस्तृत प्रतिक्रिया देख मन को सुकून मिला , आपको मेरे कुछ शेर अच्छे लगे तो लगा मेरी  मेहनत सफल हुई |  उत्साह वर्धन के लिए आपका  ह्रदय आभार 


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on August 30, 2025 at 12:12pm

आदरणीय गिरिराज भाईजी, आपकी प्रस्तुति का यह लिहाज इसलिए पसंद नहीं आया कि यह रचना आपकी प्रिया विधा में है, बल्कि इसके कई अश’आर कई स्तरों पर अर्थवान होते हैं. 

जो बच्चे दूर हैं माँ –बाप – घर से

वो पत्ते गिर चुके समझो, शज़र से  .. ... स्थानीय दूरी और सांस्कारिक दूरी के बीच का जो भावांतर है वह इस मतले को वाकई बड़ा करता है. 

  

शिखर पर जो मिला तनहा मिला है

मरासिम हो अहम, तो बच शिखर से ... क्या बात है, आदरणीय ! मुझे अटलजी की एक प्रसिद्ध कविता का स्मरण हो आया - 

मेरे प्रभु ! मुझे इतनी ऊँचाई कभी मत देना / गैरों को गले न लगा सकूँ, / इतनी रुखाई कभी मत देना.. 

 

रसोई  में  मिला  वो स्वाद  आख़िर

गुमा था जो किचन में  उम्र  भर से  ... इस शेर ने मुझे भावमय कर दिया. रसोई और किचन का भेद/ अंतर किस महीनी से निखरा है.  

 

तू बाहर बन सँवर के आये जितना

मैं भीतर झाँक सकता हूँ , नज़र से ... भाईजी, झाँका तो नजर से ही जाता है. फिर इस नजर की आवश्यकता क्यों बनी ? ’नजर’ के स्थान पर यदि ’असर’ का प्रयोग कर देखिए, क्या बात बनती दीख पड़ती है? 

 

छिपी  है ज़िंदगी  में  मौत  हरदम

वो छू  लेगी  अगर  भागेगा डर से  ... हम्म्म.. हमारे यहाँ एक मसल है, जिसका लुब्बेलुबाब है, कि मौत से नहीं उसके ’परक जाने’ से डर लगता है.

 

खुशी बेनाम है, ज़िद्दी है, बस वो

चली आयी है मिलने फिर किधर से .. यह शेर मेरे पास बहुत नहीं खुल सका. हालाँकि, इसका भावार्थ समझ रहा हूँ. कि, खुशी से उम्मीद तो न थी कि वो मिलने को चली आये या उत्सुक हो.  

 

लिये  कश्कोल अब  वो  घूमता  है

गदा खाली  न  भेजा जिसने दर से  .. समय-समय की बात है. और, श्रेय और प्रेय की भावनाएँ भी किये गये कार्य की गरिमा और उपलब्धियों को प्रभावित करती है. ’कर्त्ता होने’ का तीक्ष्ण भाव कार्य-परिणाम को कमतर कर ही देता है. कहा भी गया है न, बोये पेड़ बबूल का, आम कहाँ से होय ? कर्त्ता होने के उत्कट भाव से ऐसी ही दुर्गतियों से पाला पड़ता है. 

  

तू चाहे चल, घिसट या  दौड़ता  रह

नहीं मुमकिन अलग  होना सफ़र से ...  वाह वाह ! एक जिंदा आदमी जिंदगी के सफर से व्गि हो ही नहीं सकता. जिंदगी एक सफर है. अब इसे निबाहना ही पुरुषार्थ है. यही प्रारब्ध को साधता है. 

आपकी प्रस्तुति की हमने भाव-यात्रा की. अच्छा लगा. हार्दिक बधाइयाँ 

  


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on August 25, 2025 at 4:54pm

आदरणीय चेतन प्रकाश भाई ग़ज़ल पर उपस्थित हो उत्साह वर्धन करने के लिए आपका हार्दिक  आभार 
आदरणीय आपकी सलाह उचित है , सलाह के अनुसार सुधार अवश्य कर लूंगा , आपका पुनः आभार 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on August 25, 2025 at 4:51pm

आदरणीय सुशील भाई  गज़ल की सराहना कर उत्साह वर्धन करने के लिए आपका आभार 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on August 25, 2025 at 4:50pm

आदरणीय लक्ष्मण भाई , उत्साह वर्धन के लिए आपका हार्दिक आभार 

Comment by Chetan Prakash on August 24, 2025 at 10:58pm

खूबसूरत ग़ज़ल हुई आदरणीय गिरिराज भंडारी जी ।

"छिपी है ज़िन्दगी मैं मौत हरदम

वो छू लेगी अगर ( जो तू ) भागेगा डर के 

सुझाया हुआ  विकल्प कदाचित  बेहतर होता 

क्योंकि  पूरा शे'र  बिना कर्ता रह जाएगा !

सादर!

Comment by Sushil Sarna on August 23, 2025 at 2:05pm
आदरणीय गिरिराज भंडारी जी बहुत सुंदर यथार्थवादी सृजन हुआ है । हार्दिक बधाई सर
Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on August 23, 2025 at 10:03am

आ. भाई गिरिराज जी, सादर अभिवादन। बहुत खूबसूरत गजल हुई है। हार्दिक बधाई।

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Activity

Ashok Kumar Raktale replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-185
"प्रारम्भ (दोहे) अंत भला तो सब भला, कहते  सब ये बात। क्या आवश्यक है नहीं, इक अच्छी…"
18 hours ago
Ashok Kumar Raktale replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-185
"आदरणीय  जयहिंद रायपुरी जी अच्छा हायकू लिखा है आपने. किन्तु हायकू छोटी रचना है तो एक से अधिक…"
19 hours ago
Jaihind Raipuri replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-185
"हाइकु प्रारंभ है तो अंत भी हुआ होगा मध्य में क्या था मौलिक एवं अप्रकाशित "
yesterday
Admin replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-185
"स्वागतम"
Friday
Admin posted a discussion

"ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-185

आदरणीय साहित्य प्रेमियो,जैसाकि आप सभी को ज्ञात ही है, महा-उत्सव आयोजन दरअसल रचनाकारों, विशेषकर…See More
Tuesday
Jaihind Raipuri commented on Jaihind Raipuri 's blog post वो समझते हैं मस्ख़रा दिल हैं
"आदरणीय रवि भसीन 'शाहिद ' जी सादर अभिवादन प्रथम तो मैं क्षमाप्रार्थी हूँ देरी से आने की…"
Apr 7
Sushil Sarna posted a blog post

दोहा दशम. . . . . उम्र

दोहा दशम् . . . . उम्रठहरी- ठहरी उम्र अब, करती एक सवाल ।कहाँ गई जब जिंदगी, रहती थी खुशहाल ।।यादों…See More
Apr 6
रवि भसीन 'शाहिद' commented on Jaihind Raipuri 's blog post वो समझते हैं मस्ख़रा दिल हैं
"आदरणीय Jaihind Raipuri साहिब, नमस्कार। बढ़िया ग़ज़ल हुई है, बधाई स्वीकार करें। /ये मेरा…"
Apr 3
आशीष यादव added a discussion to the group धार्मिक साहित्य
Thumbnail

चल मन अब गोकुल के धाम

चल मन अब गोकुल के धाम अद्भुत मनहर बाल रूप में मिल जाएंगे श्याम कि चल मन अब……………………….कटि करधनी शीश…See More
Apr 3
अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-132 (विषय मुक्त)
"आदरणीय अशोक भाईजी धन्यवाद ... मेरा प्रयास  सफल हुआ।"
Mar 31
अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव replied to Admin's discussion 'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 177 in the group चित्र से काव्य तक
"वाह वाह वाह !!! बहुत दिनों बाद ऐसी लाजवाब प्रतिक्रिया पढने में आई है। कांउटर अटैक ॥ हजारों धन्यवाद…"
Mar 31
Ashok Kumar Raktale replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-132 (विषय मुक्त)
"  आदरणीय शेख शाहज़ाद उस्मानी जी सादर, सरकारी शालाओं की गलत परम्परा की ओर ध्यान आकृष्ट कराती…"
Mar 31

© 2026   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service