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दोहा सप्तक ..रिश्ते

दोहा सप्तक. . . . रिश्ते

आपस के माधुर्य को, हरते कड़वे बोल ।
मिटें जरा सी चूक से, रिश्ते सब  अनमोल ।।

शंका से रिश्ते सभी, हो जाते बीमार ।
संबंधों में बेवजह,  आती विकट दरार ।।

रिश्ता रेशम सूत सा, चटक चोट से जाय ।
कालान्तर में वेदना,  इसकी भुला न पाय ।।

बंधन रिश्तों के सभी,  आज हुए कमजोर ।
ओझल मिलने के हुए, आँखों से अब छोर ।।

रिश्तों में अब स्वार्थ का, जलता रहता दीप ।
दुर्गंधित से नीर में, खाली मुक्ता से सीप ।।

संबंधों को चाहिए, प्रेम जनित सम्मान ।
रिश्तों के हर पृष्ठ को, पढ़िए अपना जान ।।

रिश्ते निर्मल नीर से, जीवन का शृंगार ।
आज दहकते स्वार्थ के, हरदम ही अंगार ।।

सुशील सरना / 8-5-24

मौलिक एवं अप्रकाशित 

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Comment by Sushil Sarna on June 2, 2024 at 6:48pm
आदरणीय मिथिलेश वामनकर जी के भावों को आत्मीय मान से सम्मानित करने का दिल से आभार आदरणीय

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on June 2, 2024 at 1:16pm

आदरणीय सुशील सरना जी, बहुत बढ़िया दोहे हुए हैं हार्दिक बधाई। सादर

Comment by Sushil Sarna on May 25, 2024 at 4:30pm
आदरणीय लक्ष्मण धामी जी सृजन के भावों को मान देने का दिल से आभार आदरणीय ।
Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on May 21, 2024 at 7:17am

आ. भाई सुशील जी, सादर अभिवादन। सुंदर दोहे रचे हैं। हार्दिक बधाई।

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