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कहो तो सुना दूँ फ़साना किसी का

122 122 122 122 

कहो तो सुना दूँ फ़साना किसी का

वो इज़हार-ए-उल्फ़त जताना किसी का

सुधार

नज़र से महब्बत जताना किसी का

हँसाना किसी का रुलाना किसी का

भुलाओगे कैसे सताना किसी का

नहीं रोक पाई कभी चाहकर मैं

दबे पा ख़यालों में आना किसी का

है यह भी महब्बत का दस्तूर यारो

न दिल भूले जो दिल से जाना किसी का

बहुत कोशिशें कीं मनाने की फ़िर भी

न मुमकिन हुआ लौट आना किसी का

दिल ए बेक़रारी की हद ही तो थी वह

जो समझे नहीं हम बहाना किसी का

नहीं रास आया ज़माने को "निर्मल" 

मेरे दिल को अपना बताना किसी का

मौलिक व अप्रकाशित

रचना निर्मल

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Comment

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Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on December 17, 2021 at 8:24pm

वाह क्या ही खूबसूरत ग़ज़ल कही आदरणीया...बधाई

Comment by Samar kabeer on December 10, 2021 at 7:03pm

//वो इज़हार-ए-उल्फ़त जताना किसी का ....इज़हार और जताना एक ही वंश के शब्द हैं, लगभग पर्यायवाची //

सहमत ।

Comment by Nilesh Shevgaonkar on December 10, 2021 at 6:23pm

आ. रचना जी,
ग़ज़ल पर गुणीजन पहले ही टिप्पणी दे चुके हैं अत: अधिक कहने कि संभावना नहीं है फिर भी मतला देखने से भाषाई त्रुटी ध्यान में आती है.
वो इज़हार-ए-उल्फ़त जताना किसी का ....इज़हार और जताना एक ही वंश के शब्द हैं, लगभग पर्यायवाची अत: इस पर गौर करें.
सादर 

Comment by अमीरुद्दीन 'अमीर' बाग़पतवी on December 10, 2021 at 5:07pm

//कि ख़ुद से भी ज़्यादा भरोसा किया था'//

जनाब अमीर साहिब, आपके सुझाये इस मिसरे में आपने 'ज़ियाद:' शब्द को 22 पर लिया है जो ग़ज़ल में उचित नहीं,इसे 122 पर ही लेना उचित होता है 

जी मुहतरम बहतर है। 

Comment by Samar kabeer on December 10, 2021 at 3:28pm

मुहतरमा रचना भाटिया जी आदाब, ग़ज़ल का अच्छा प्रयास है, बधाई स्वीकार करें ।

'हँसाना किसी का रुलाना किसी का

भुलाओगे कैसे सताना किसी का'

इस मतले पर जनाब अमीर जी का सुझाव अच्छा है ।

'दिल ए बेक़रारी की हद ही तो थी वह'

इस मिसरे को यूँ कह सकती हैं:-

'हमारी महब्बत की मासूमियत थी'

Comment by Samar kabeer on December 10, 2021 at 3:20pm

//कि ख़ुद से भी ज़्यादा भरोसा किया था'//

जनाब अमीर साहिब, आपके सुझाये इस मिसरे में आपने 'ज़ियाद:' शब्द को 22 पर लिया है जो ग़ज़ल में उचित नहीं,इसे 122 पर ही लेना उचित होता है । 

Comment by Shyam Narain Verma on December 10, 2021 at 9:54am
नमस्ते जी, बहुत ही सुंदर प्रस्तुति, हार्दिक बधाई l सादर
Comment by Rachna Bhatia on December 9, 2021 at 7:46pm

आदरणीय अमीरुद्दीन अमीर जी ग़ज़ल तक आने के लिए बेहद शुक्रिय:। आपने मतला बहुत अच्छा कर दिया आभार।शेर पर इस्लाह आपकी अच्छी है पर तक़ाबुल ए रदीफ़ एब आ जाएगा।

Comment by अमीरुद्दीन 'अमीर' बाग़पतवी on December 9, 2021 at 6:22pm

मुहतरमा रचना भाटिया जी आदाब, ख़ूबसूरत अहसासात से लबरेज़ अच्छी ग़ज़ल कही है आपने मुबारकबाद पेश करता हूँ।

कुछ मशविरे पेश करना चाहता हूँ, 

'हँसाना किसी का रुलाना किसी का

 भुलाओगे कैसे सताना किसी का'     इस शे'र में शेरियत कम है, मुनासिब समझें तो यूँ कर सकते हैं - 

'हँसाना रुलाना रुला कर हँसाना 

भुलाएं वो कैसे सताना किसी का' 

'दिल ए बेक़रारी की हद ही तो थी वह' इस मिसरे का शिल्प और वाक्य विन्यास सही नहीं है, मिसरा यूँ कह सकते हैं - 

'कि ख़ुद से भी ज़्यादा भरोसा किया था'  

 जो समझे नहीं हम बहाना किसी का'     सादर।

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