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ग़ज़ल-जय गान पर

2122 2122 2122 212

1

जब भी छाए अब्र मुश्किल के वतन की आन पर

खेले हैं तब तब हमारे तिफ़्ल अपनी जान पर

2

आज़मा ले लाख अपना रौब रुतबा शान पर

हो न पाएगा कभी हावी तू हिन्दुस्तान पर

3

हम नहीं होते परेशाँ धर्म से या ज़ात से

ख़ूँ जले अपना तो झूठे और बेईमान पर

4

माना हैं मतभेद भाषा वेष भूषा धर्म में

फ़ख़्र करते हैं प सब भारत के बढ़ते मान पर

5

एक दिन ऐसा भी "निर्मल" देखना तुम आएगा

मुस्कुराएगा फ़लक भी हिन्द के जय गान पर

मौलिक व अप्रकाशित

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Comment

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Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on November 11, 2021 at 10:33pm

आ. रचना बहन, सादर अभिवादन। सुंदर गजल हुई है। हार्दिक बधाई।

Comment by Rachna Bhatia on November 6, 2021 at 9:51pm

आदरणीय अमीरुद्दीन अमीर जी, ग़ज़ल तक आने आभार। बहुत अच्छी राय दी आपने। आभार। 

Comment by अमीरुद्दीन 'अमीर' on November 6, 2021 at 12:48pm

मुहतरमा रचना भाटिया जी आदाब, अच्छी ग़ज़ल हुई है मुबारकबाद पेश करता हूँ। 

आज़मा ले लाख अपना रौब रुतबा शान पर.    मुनासिब समझें तो इस मिसरे को यूँ कर लें :

'कोशिशें बेकार होंगी आज़मा के देख ले' 

'फ़ख़्र करते हैं प सब भारत के बढ़ते मान पर'   मुनासिब समझें तो इस मिसरे को यूँ कर लें :

'फ़ख़्र सबको है मगर भारत के बढ़ते मान पर'      सादर।

Comment by Rachna Bhatia on November 5, 2021 at 2:01pm

आदरणीय समर कबीर सर् सादर नमस्कार। ग़ज़ल पर इस्लाह करने के लिए तहेदिल से शुक्रिय:। सर्, जी, सुधार करके दिखाती हूँ।

सादर।

Comment by Samar kabeer on November 4, 2021 at 3:23pm

मुहतरमा रचना भाटिया जी आदाब, ग़ज़ल का अच्छा प्रयास है, बधाई स्वीकार करें ।

'आज़मा ले लाख अपना रौब रुतबा शान पर

हो न पाएगा कभी हावी तू हिन्दुस्तान पर'

इस मतले का ऊला बदलने का प्रयास करें और इसे मतले की जगह शे'र कर लें ।

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