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सुलगते अँधेरे . . .

सुलगते अँधेरे  .......

न जाने आज
मन इतना उदास क्यों है
लगता है
स्मृतियों की सीलन से
मन की दीवारें
भुरभुरा सी गई हैं

यादों के पारदर्शी प्रतिबिम्ब
जैसे गिरती दीवारों पर
मन की बेबसी पर
अट्टहास लगा लगा रहे हों

कितनी ढीठ है
ये बरसाती हवा
जानती है मेरी आकुलता को
फिर भी मुझे छू कर
मुझसे मेरा हाल पूछती है

अब अच्छी नहीं लगतीं मुझे
आहटें
मन के वातायन पर गूँजती
बेसुरी दस्तक की थपथपाहट
मेरी प्रतीक्षा को
बार-बार पुनर्जीवित कर जाती है

डरती हूँ
मन की गिरती हुई
भुरभुरी दीवारों के नीचे
दब कर न रह जाए
मेरी प्रतीक्षा

शायद इसीलिए
आज मेरे मन में
उदासियों के डेरे हैं
सुलगते अँधेरे हैं
बुझे- बुझे सवेरे हैं

सुशील सरना
मौलिक एवं अप्रकाशित

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Comment by Sushil Sarna on July 18, 2021 at 12:21pm
आदरणीय समर कबीर जी आदाब सृजन पर आपकी समीक्षात्मक प्रशंसा का दिल से आभार आदरणीय जी । सर अभी एडिट करता हूँ ।हार्दिक आभार सर ।
Comment by Samar kabeer on July 17, 2021 at 7:06pm

जनाब सुशील सरना जी आदाब, अच्छी रचना हुई है, बधाई स्वीकार करें ।

अन्धेरे --''अँधरे''

'अब अच्छी नहीं लगती मुझे
आहटें'

इस पंक्ति में 'लगती' को "लगतीं" कर लें ।

Comment by Sushil Sarna on July 16, 2021 at 12:59pm
आदरणीय लक्ष्मण धामी जी सृजन के भावों को मान देने का दिल से आभार आदरणीय
Comment by Sushil Sarna on July 16, 2021 at 12:59pm
आदरणीय चेतन प्रकाश जी आपकी समीक्षात्मक टिप्पणी का दिल से आभार आदरणीय । सर आपके द्वारा इंगित त्रुटि को मैंने संशोधित कर दिया है । यह असावधानी वश हुआ । इसमें मैंने नायिका की मनोदशा को दर्शाने का प्रयास किया है सर । सादर नमन
Comment by Sushil Sarna on July 16, 2021 at 12:54pm
आदरणीय अमीरुद्दीन साहिब, आदाब - सृजन आपकी स्नेहिल प्रशंसा का दिल से आभारी है सर
Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on July 15, 2021 at 6:59pm

आ. भाई सुशील जी, सुंदर प्रस्तुति हुई है । हार्दिक बधाई।

Comment by Chetan Prakash on July 14, 2021 at 2:00pm

नमस्कार, आदरणीय  ! मधुर  स्मृति ! अच्छी रचना  हुई  है, लेकिन  वर्तनी  दोष कम से कम मुझ जैसे  आपके चिर- परिचित  को आश्चर्य चकित  करते  हैं, यथा, ' प्रतिक्षा ! इसके  अतिरिक्त  आप स्वयं अपने घटित सत्य को वाणी  दे रहे अथवा  किसी स्त्री कवयित्री  की मनोदशा का वर्णन कर रहे  हैं, स्पष्ट  नहीं  हो  सका ! सादर

Comment by अमीरुद्दीन 'अमीर' बाग़पतवी on July 14, 2021 at 9:08am

आदरणीय सुशील सरना जी आदाब, उत्तम मर्मस्पर्शी रचना हुई है, आह... बहुत बहुत बधाई स्वीकार करें। सादर। 

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