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हम तो हल के दास ओ राजा-लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

२२/२२/२२/२२


हम तो हल के दास ओ राजा
कम देखें  मधुमास  ओ राजा।१।
*
रक्त  को  हम  हैं  स्वेद  बनाते
क्या तुमको आभास ओ राजा।२।
*
अन्न तुम्हारे पेट में भरकर
खाते हैं सल्फास ओ राजा।३।
*
पीता  हर  उम्मीद  हमारी
कैसी तेरी प्यास ओ राजा।४।
*
हम से दूरी  मत  रख इतनी
आजा थोड़ा पास ओ राजा।५।
*
खेती - बाड़ी  सब  सूखेगी
जो तोड़ेगा आस ओ राजा।६।

मौलिक/अप्रकाशित
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

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Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on May 20, 2021 at 1:23pm

आ. भाई राम आशरे जी, सादर अभिवादन । गजल पर उपस्थिति और सराहना के लिए हार्दिक धन्यवाद।"

Comment by Ram Ashery on May 20, 2021 at 11:40am
अति सुंदर अभिव्यक्ति बहुत बहुत बधाई स्वीकार हो
Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on May 6, 2021 at 11:42am

आ. अमिता जी, गजल पर उपस्थिति व स्नेह के लिए आभार ।

Comment by amita tiwari on May 6, 2021 at 1:44am

पीता  हर  उम्मीद  हमारी
कैसी तेरी प्यास ओ राजा

बहुत उत्तम ,बहुत सटीक  गागर मे सागर । वाह बधाई 

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on February 13, 2021 at 5:40pm

आ. भाई विजय निकोर जी , सादर अभिवादन। आपकी मनभावन उपस्गथिति से लेखन सफल हुइ। गजल पर उपस्थिति और प्रशंसा के लिए आभार।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on February 13, 2021 at 5:38pm

आ. रचना बहन , सादर अभिवादन। गजल पर उपस्थिति और प्रशंसा के लिए आभार।

Comment by vijay nikore on February 13, 2021 at 4:54pm

प्रिय मित्र लक्ष्मण जी, गज़ल अच्छी लगी। बधाई।

Comment by Rachna Bhatia on February 13, 2021 at 10:49am

आदरणीय लक्ष्मण धामी'मुसाफ़िर'जी नमस्कार। शानदार ग़ज़ल हुई बधाई स्वीकार करें।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on February 12, 2021 at 7:01pm

आ. भाई क्रिस मिश्रा जी, गजल पर उपस्थिति व मनभावन टिप्पणी के लिए हार्दिक आभार ।

Comment by Krish mishra 'jaan' gorakhpuri on February 11, 2021 at 9:11pm

वाह! अद्भुत ग़ज़ल हुई है बेहतरीन, लाज़वाब।बहुत बहुत बधाई बड़े भैया।

इस ग़ज़ल की सबसे प्यारी बात मुझे ये लगी कि... ऐसा लगता है जैसे स्वत: अंतर्मन के भाव फूट पड़ें हो, कोई भी ऊपरी बनावट नहीं की गई है।पुनः बधाई और शुभकामनाएं बड़े भैया।

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