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1222   1222   122

यूँ तुझपे हक़ मेरा कुछ भी नहीं है
मगर दिल भूलता कुछ भी नहीं है

तेरी बातें भी सारी याद है पर
कहा तेरा हुआ कुछ भी नहीं है

तेरी आंखों में है गर कोई मंजिल
तो फिर ये रास्ता कुछ भी नहीं है

ग़ज़ल अपनी कलम से खुद ही निकली
तसल्ली से लिखा कुछ भी नहीं है

मेरा अफसाना जो तुम पढ़ रहे हो
ये कुछ लायक है या कुछ भी नहीं है

नज़र जिसमें तेरी सूरत न आये
यहाँ इतना नया कुछ भी नहीं है

ख़ुदा का तो इरादा कुछ हो लेकिन
मुझे अब सूझता कुछ भी नहीं है

मौलिक और अप्रकाशित

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Comment by मनोज अहसास on April 7, 2020 at 12:24pm

हार्दिक आभार आदरणीय प्रयास जारी रहेगा आशीर्वाद बनाए रखें

Comment by Samar kabeer on April 6, 2020 at 4:18pm

जनाब मनोज कुमार अहसास जी आदाब, ग़ज़ल का प्रयास अच्छा है,बधाई स्वीकार करें ।

ये देख कर प्रसन्नता हुई कि कुछ शब्दों में आपने नुक़्ते लगाए हैं,लेकिन कुछ शब्दों में नुक़्ते नहीं लगे हैं,और कोशिश करें ।

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