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तरही ग़ज़ल नंबर-3

फ़ाइलातुन फ़ाइलातुन फ़ाइलातुन फ़ाइलुन
(मक़्ते में तक़ाबुल-ए-रदीफ़ को नज़र अंदाज़ कर दें)

रफ़्ता रफ़्ता सारी अफ़वाहें कहानी हो गईं
तल्ख़ियाँ इतनी बढ़ीं रेशा दवानी हो गईं

हिज्र की रातों में इतनी बार उनके ख़त पढ़े
याद मुझको सारी तहरीरें ज़बानी हो गईं

हाल वो देखा ग़ज़ल का आज यारो,शर्म से
'मीर'-ओ-'ग़ालिब' की भी रूहें पानी पानी हो गईं

क़ह्र को बाँधें क़हर वो और टोको तो कहें
शे'र कहने की ये तरकीबें पुरानी हो गईं

जानते हो ख़ूब यारो ओबीओ के मंच पर
जिसने सीखा उसकी ग़ज़लें जाविदानी हो गईं

ज़ह्नियत का है ये झगड़ा हिन्दी उर्दू का नहीं
छोड़िये अब ये "समर" बातें पुरानी हो गईं
________

रेशा दवानी :- फ़साद
तल्ख़ियाँ :- कड़वाहटें

--समर कबीर
मौलिक/अप्रकाशित

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Comment

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Comment by Samar kabeer on April 11, 2017 at 11:27pm
जनाब मोहम्मद आरिफ़ साहिब आदाब,ग़ज़ल में शिर्कत और सुख़न नवाज़ी के लिये आपका तहे दिल से शुक्रगुज़ार हूँ ।
आपने एक फ़क़ीर को शहंशाह कह दिया ,ये क्या सितम किया ,मैं तो अभी ग़ज़ल कहना सीख ही रहा हूँ इस मंच पर ।
Comment by Samar kabeer on April 11, 2017 at 11:24pm
जनाब दिनेश कुमार जी आदाब,ग़ज़ल में शिर्कत और सुख़न नवाज़ी के लिये आपका तहे दिल से शुक्रगुज़ार हूँ ।

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on April 11, 2017 at 6:48pm

क़ह्र को बाँधें क़हर वो और टोको तो कहें शे'र कहने की ये तरकीबें पुरानी हो गईं------क्या कहने वाह्ह्ह्हह्ह लाजबाब जानते हो ख़ूब यारो ओबीओ के मंच पर जिसने सीखा उसकी ग़ज़लें जाविदानी हो गईं-----ओबीओ जिंदाबाद हम यूँ ही नहीं कहते जो सीखने आते हैं वही सीखते हैं भाई जी ये तीसरी ग़ज़ल भी लाजबाब हुई दिल से ढेरों ढेर बधाई


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on April 11, 2017 at 2:30pm

आदरणीय समर साहब, 

मुझे तो इसकी उम्मीद थी कि आप मेरे कहे को कहीं अधिक समझे होंगे और अपने निर्णयात्मक उत्तर के सापेक्ष टिप्पणीकारों को रचना प्रक्रिया पर ही केन्द्रित रहने की सलाह देंगे. इसके उलट आपके प्रश्न ने मुझे न केवल चकित किया है, बल्कि मुझे एक हद तक अपनी लघुता का भी अहसास कराया है.

आदरणीय, मेरे कहे का मंतव्य आपकी रचनाधर्मिता पर सवाल नही उठाना है, न ही उसके प्रति कोई भ्रम है. लेकिन एक रचनाकार इतना सचेत अवश्य हो कि वह अपनी रचनाओं पर आयी टिप्पणियों की तार्किकता के प्रति टिप्पणीकारों को अनावश्यक भावुकता में आने से भी बचाता रहे. कमसेकम ओबीओ पर तो अवश्य ही. यही ओबीओ पर अपनाया और स्वीकारा गया आचरण है. इसी आचरण और पाठकीय व्यवहार के तहत ही इतनी सहजता से रचनाओं का नीर-क्षीर इस मंच पर होता है, जोकि अन्यत्र दुर्लभ है. रचना पर आये सभी पाठक अपनी समझ के आधार पर ही अपनी-अपनी टिप्पणियों में अपनी बातें करते हैं, जिनमें कई बातें किसी पाठक की मानसिक दशा भी उजागर करती हैं. जो लगातार सीखने और जानने के के क्रम में उत्तरोत्तर संयत होती जाती है. ऐसा ओबीओ के अभिनव वातावरण के कारण ही होता है. तभी यहाँ मठाधीशी व्याप नहीं पायी. लेकिन इसके प्रति हर समय सचेत रहना आवश्यक है.

अपने इसी वातावरण के कारण ओबीओ का मंच प्रणम्य है जहाँ रचनाकार नहीं रचनाओं का महत्व अर्थ रखता है. इस परिप्रेक्ष्य में आपको शहंशाह आदि की पदवी से शोभायमान करना क्या ओबीओ की पाठकीय टिप्पणी के समकक्ष है ? क्या इस अन्यथा अतिशयोक्ति बचते हुए आपकी रचनाओं पर चर्चा नहीं हो सकती ? व्यक्तिगत भाव-प्रदर्शन एक बात है, और इस मंच पर टिप्पणियों के दायरे भिन्न हैं. आदरणीय, नये सदस्यों को न केवल इन विन्दुओं के प्रति सचेत करना हमारा दायित्व हो जाता है, बल्कि ऐसा करने से अपनी कोशिशों को लगातार बढ़ाते जाने में सहुलियत भी होती है. किसी संवाद के क्रम में किसी वरिष्ठ के प्रति आभार अभिव्यक्ति, उसके गुणों की सकारात्मक चर्चा और उसके व्यवहार का गुणगान एक बात है. किसी रचना के सापेक्ष ऐसी टिप्पणियाँ अन्य पाठकों को कुछ अन्यथा कहने से रोकती भी है. वैसे आजकल इस मंच पर गुरुदेव आदि आम संज्ञा होने लगी हैजिसके प्रति हम एक समय अत्यंत संवेदनशील हुआ करते थे. मैंने तो जाने कितनों को इसे लेकर समझाया है. नहीं माना तो लताड़ा भी है. और तब विरुदावलि गाने वाले उस तथाकथित पाठक ने अपना असली वो रूप दिखाया कि मंच से भी बाहर चला गया है. ऐसे संबोधनों की क्या आवश्यकता है, आदरणीय, जिसकी गरिमा का ख़याल तक नहीं है ?

विश्वास है, आप मेरे कहे का अर्थ समझ सहयोगी भाव बनाये रखेंगे.

सादर

Comment by बासुदेव अग्रवाल 'नमन' on April 11, 2017 at 11:07am
आ0 समर साहब की तरही मुशायरे की जमीन पर एक और कामयाब ग़ज़ल। दिल से बधाई स्वीकार करें।
जानते हो ख़ूब यारो ओबीओ के मंच पर
जिसने सीखा उसकी ग़ज़लें जाविदानी हो गईं
आपके इस शेर को मैं अपने पर घटित होते देख रहा हूँ।
Comment by Nilesh Shevgaonkar on April 11, 2017 at 6:37am

देर से आने की मुआफ़ी चाहता हूँ...दरअसल मुंबई गया हुआ था..कल रात ही लौटा हूँ..
ग़ज़ल पर क्या कहूँ... इतनी मुश्किल ज़मीन पर आप दर्ज़न के हिसाब से मतले और शेर कहे जा रहे   हैं  कि मैं आवाक हूँ...और फिर तीसरी  ग़ज़ल में ये शेर ...
.
हिज्र की रातों में इतनी बार उनके ख़त पढ़े
याद मुझको सारी तहरीरें ज़बानी हो गईं.....  वाह वा ..
ये मेरी ख़ुशनसीबी है कि मैं   आप से और इस मंच से जुड़ा हुआ हूँ ..
सादर 

Comment by Samar kabeer on April 10, 2017 at 2:43pm
जनाब सौरभ पाँडे जी आदाब,

// आदरणीय सज्जनो ! रचना पर रचना के सापेक्ष ही टिप्पणियाँ दें. इस मंच पर रचनाकार कभी अपनी रचना से बड़ा नही होता. आगे से ध्यान रखा जाय. क्यों कि यही इस मंच का आग्रह रहा है.//
मैं आपकी इस टिप्पणी का मतलब नहीं समझा जनाब,यह लिखने की ज़रूरत क्यूँ पेश आई ?
Comment by DR. BAIJNATH SHARMA'MINTU' on April 9, 2017 at 11:24pm

आदरणीय समर साहेब....उम्दा ग़ज़ल ....हार्दिक बधाई स्वीकार करें 


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on April 9, 2017 at 10:20pm

और.. सदस्यों से जिनने इस प्रस्तुति पर टिप्पणी दी हैं. 

आदरणीय सज्जनो ! रचना पर रचना के सापेक्ष ही टिप्पणियाँ दें. इस मंच पर रचनाकार कभी अपनी रचना से बड़ा नही होता. आगे से ध्यान रखा जाय. क्यों कि यही इस मंच का आग्रह रहा है. 

सादर


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on April 9, 2017 at 10:16pm

बढ़िया .. हा हा हा.. 

वैसे भी ये एक गंभीर प्रयास है.. इस शेर के हवाले से बार-बार बधाइयाँ -- 

हिज्र की रातों में इतनी बार उनके ख़त पढ़े
याद मुझको सारी तहरीरें ज़बानी हो गईं

आगे के शेर किस्से हैं और मैं आपके अंदाज़ का मज़ा ले रहा हूँ जनाब .. :-))

जय-जय 

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