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ग़ज़ल ..22 22 22 22 22 2 ....सीला माँ (शीतला माता )

ताप घृणा का शीतल करदे सीला माँ

इस ज्वाला को तू जल करदे सीला माँ

 

इस मन में मद दावानल सा फैला है

करुणा-नद की कलकल करदे सीला माँ

 

सूख गया है नेह ह्रदय का ईर्ष्या से

इस काँटे को कोंपल करदे सीला माँ

 

प्यास लबों पर अंगारे सी दहके है

हर पत्थर को छागल करदे सीला माँ

 

सूरज सर पर तपता है दोपहरी में

सर पर अपना करतल करदे सीला माँ

 

दूध दही हो जाता है शीतलता से

भाप जमा कर बादल करदे सीला माँ

 

गम की धूप सताती है फिर बेटों को

पग पग पर फिर पीपल करदे सीला माँ

 

खंडित को भी मंडित कर देती है तू 

कंकर को तू कोमल करदे सीला माँ

 

क्रोध दया को छाँव नहीं देगा मन में

इस सहरा को जंगल करदे सीला माँ

मौलिक व अप्रकाशित 

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Comment

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Comment by umesh katara on March 13, 2015 at 6:52pm

आपकी हर गजल शानदार होती है सर 
वाहहहहहहहह

इस मन में मद दावानल सा फैला है

करुणा-नद की कलकल करदे सीला माँ


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on March 13, 2015 at 6:12pm

सीला माँ के साथ आपकी कलम के सम्मुख नत हूँ बहुत सुन्दर भावपूर्ण अशआर हुए हैं क्या कहने 

सभी एक से बढ़कर एक ...ये तो बहुत ही ज्यादा पसंद आये 

सूख गया है नेह ह्रदय का ईर्ष्या से

इस काँटे को कोंपल करदे सीला माँ

 

प्यास लबों पर अंगारे सी दहके है

हर पत्थर को छागल करदे सीला माँ

 बहुत बहुत बधाई आपको खुर्शीद भाई जी 

Comment by Hari Prakash Dubey on March 13, 2015 at 5:39pm

आदरणीय खुर्शीद भाई , बहुत ही सुन्दर ,सधी हुई भावपूर्ण रचना है,

सूख गया है नेह ह्रदय का ईर्ष्या से

इस काँटे को कोंपल करदे सीला माँ.....सुन्दर कामना , बहुत बहुत बधाई आपको ! सादर 

Comment by Krish mishra 'jaan' gorakhpuri on March 13, 2015 at 4:38pm

इस मन में मद दावानल सा फैला है

करुणा-नद की कलकल करदे सीला माँ      क्या बात है! क्या बात है!

सूख गया है नेह ह्रदय का ईर्ष्या से

इस काँटे को कोंपल करदे सीला माँ    अभिनन्दन ! अभिनन्दन!

आदरणीय खुर्शीद सर!! पग पग पर आपकी रचनाये हमें नया पाठ सिखा रही है! आप जैसे गुरुभाई पाकर मै धन्य हुआ!!बारम्बार नमन!!

Comment by Shyam Narain Verma on March 13, 2015 at 12:17pm
इस लाजवाब, उम्दा ग़ज़ल के लिए बहुत बहुत बधाई 

कृपया ध्यान दे...

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