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तरही ग़ज़ल नम्बर 2

नोट :-"तरही मुशायरे में जितनी ग़ज़लें शामिल हुईं, इस ग़ज़ल के क़वाफ़ी उन सबसे अलग हैं"

मफ़ऊल फ़ाइलातु मुफ़ाईल फ़ाइलुन

लेकर गई है हमको जिहालत कहाँ कहाँ
मांगी है तेरे वास्ते मन्नत कहाँ कहाँ

ये आज तेरे पास जो दौलत के ढेर हैं
सच बोल तूने की है ख़ियानत कहाँ कहाँ

अब तक भरी हुई थी जो तेरे दिमाग़ में
फैलाई है वो तूने ग़िलाज़त कहाँ कहाँ

तूने वतन को बेचा है अपने मफ़ाद में
होती है देखें तेरी मज़म्मत कहाँ कहाँ

फ़हरिस्त इसकी अब तो बताना फ़ुज़ूल है
हमने उठाई है ये हज़ीमत कहाँ कहाँ

आती है शर्म तुझको बताते हुए "समर"
तेरी बनी है इश्क़ में दुर्गत कहाँ कहाँ

___

मन्नत :- मान,नियाज़,भेंट
ख़ियानत :- ग़बन, धोका,फ़रेब, दग़ा
ग़िलाज़त :- गन्दगी
मफ़ाद :- फ़ायदा
मज़म्मत :- निंदा
फ़हरिस्त :- सूची
फ़ुज़ूल :- बेकार
हज़ीमत :- हार,शिकस्त
दुर्गत :- ख़राबी


--समर कबीर
मौलिक/अप्रकाशित

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Comment by Samar kabeer on September 17, 2017 at 9:05pm
बहना कल्पना भट्ट जी आदाब,ग़ज़ल में शिर्कत और सुख़न नवाज़ी के लिए आपका बहुत बहुत शुक्रिया ।
Comment by KALPANA BHATT ('रौनक़') on September 17, 2017 at 7:44pm

आदाब आदरणीय समर भाई जी , बेहतरीन ग़ज़ल ,कही है आपने , जिसके लिए आपको बहुत बहुत बधाई |

अब तक भरी हुई थी जो तेरे दिमाग़ में
फैलाई है वो तूने ग़िलाज़त कहाँ कहाँ

तूने वतन को बेचा है अपने मफ़ाद में
होती है देखें तेरी मज़म्मत कहाँ कहाँ

फ़हरिस्त इसकी अब तो बताना फ़ुज़ूल है
हमने उठाई है ये हज़ीमत कहाँ कहाँ 

बहुत खूब | 

Comment by Samar kabeer on September 15, 2017 at 4:25pm
जनाब सलीम रज़ा साहिब आदाब,ग़ज़ल में शिर्कत और दाद-ओ-तहसीन के लिये आपका तहे दिल से शुक्रगुज़ार हूँ ।
Comment by SALIM RAZA REWA on September 15, 2017 at 2:53pm
जनाब समर साहब यक़ीनन आप लफ्जों के जादूगर हो क्या क़फ़ियों का इंतख़ाब है मुबारक़बाद.
Comment by Samar kabeer on August 14, 2017 at 10:51am
जनाब सी.एम्.उपाध्याय जी आदाब,ग़ज़ल में शिर्कत और सुख़न नवाज़ी के लिये आपका तहे दिल से शुक्रगुज़ार हूँ ।
Comment by C.M.Upadhyay "Shoonya Akankshi" on August 14, 2017 at 12:37am

आदरणीय  Samar kabeer साहब,
यूँ तो पूरी ग़ज़ल ही बहुत शानदार है पर इस शेर का तो जवाब ही नहीं :
"अब तक भरी हुई थी जो तेरे दिमाग़ में
फैलाई है वो तूने ग़िलाज़त कहाँ कहाँ"
दिली मुबारकबाद स्वीकार करिएगा | 

Comment by Samar kabeer on August 8, 2017 at 11:16pm
बहना राजेश कुमारी जी आदाब,ग़ज़ल आपको पसंद आई लिखना सार्थक हुआ,ग़ज़ल में शिर्कत और सुख़न नवाज़ी के लिये आपका तहे दिल से शुक्रगुज़ार हूँ ।

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on August 8, 2017 at 10:12pm

ये आज तेरे पास जो दौलत के ढेर हैं
सच बोल तूने की है ख़ियानत कहाँ कहाँ----कमाल का शेर 

अब तक भरी हुई थी जो तेरे दिमाग़ में
फैलाई है वो तूने ग़िलाज़त कहाँ कहाँ---वाह्ह्ह वाह्ह 

वैसे तो भाई जी पूरी ग़ज़ल ही लाजबाब है एक दम नए काफिये 

बहुत पसंद आई देर से पंहुची इस ग़ज़ल पर जिसका मुझे खेद है 

दिल से ढेरो दाद हाजिर है |

Comment by Samar kabeer on August 7, 2017 at 3:56pm
जनाब भाई विजय निकोर जी आदाब,आपका स्नेह हमेशा मेरा हौसला बढ़ाता है,ग़ज़ल में शिर्कत और दाद-ओ-तहसीन के लिये आपका तहे दिल से शुक्रगुज़ार हूँ ।
Comment by vijay nikore on August 7, 2017 at 3:22pm

//फ़हरिस्त इसकी अब तो बताना फ़ुज़ूल है
हमने उठाई है ये हज़ीमत कहाँ कहाँ

आती है शर्म तुझको बताते हुए "समर"
तेरी बनी है इश्क़ में दुर्गत कहाँ कहाँ//...

यह ख्याल, और उनको जिस तरह लफ़ज़ों की खूबसूरती से आपने कसा है, उससे यह गज़ल पढ़ते ही बनती है;

बस, बहा ले जा रही है।

 

यह खूबसूरती ऐसे ही ज़िन्दा रहे, और हम सभी को ऐसे ही लुभाती रहे।

आदाब और बधाई, भाई समर जी।

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