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गीत...धीरे धीरे आओ चन्दा (सार छंद 16,12 पर आधारित गीत)

धीरे धीरे आओ चन्दा
धीरे धीरे आओ

होंठों पर मुस्कान सजाये
सोया है मृग छौना
आहट से तेरी टूटेगा
उसका ख्वाब सलोना
बात समझ भी जाओ चन्दा
धीरे धीरे आओ

तुम चलते हो पीछे पीछे
चलते हैं सब तारे
और तुम्हारी सुंदरता पर
इठलाते हैं सारे
तुम तो मत इतराओ चन्दा
धीरे धीरे आओ

ऐसे भी कुछ घर आँगन हैं
बसते जहाँ अँधेरे
भूख वहाँ करताल बजाये
संध्या और सबेरे
उस दर भी मुस्काओ चन्दा
धीरे धीरे आओ
(मौलिक एवं अप्रकाशित)
बृजेश कुमार 'ब्रज'

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Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on June 10, 2018 at 4:16pm

स्वागत संग आभार आदरणीया रक्षिता जी...

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on June 10, 2018 at 4:15pm

तहेदिल से शुक्रिया आदरणीय आरिफ जी..

Comment by Satyanarayan Singh on June 9, 2018 at 9:15pm

ऐसे भी कुछ घर आँगन हैं 
बसते जहाँ अँधेरे 
भूख वहाँ करताल बजाये 
संध्या और सबेरे 
उस दर भी मुस्काओ चन्दा
धीरे धीरे आओ

 बहुत ही सुन्दर गीत आदरणीय हार्दिक बधाई 

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on June 9, 2018 at 8:39pm

आ. भाई बृजेश जी, इस भावप्रवण रचना के लिए बहुत बहुत हार्दिक बधाई ।

Comment by रक्षिता सिंह on June 9, 2018 at 7:37pm

आदरणीय वृजेश जी नमस्कार,

बहुत ही सुन्दर पंक्तियाँ ...एक लोरी की तरह !

हार्दिक बधाई  स्वीकार करें।

Comment by Mohammed Arif on June 9, 2018 at 6:57pm

आदरणीय बृजेश कुमार जी आदाब,

                             बहुत ही सुंदर गीत की पेशकश । हार्दिक बधाई स्वीकार करें ।

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on June 9, 2018 at 3:01pm

आपका हार्दिक अभिनदंन है आदरणीय महेंद्र जी..सादर

Comment by Mahendra Kumar on June 9, 2018 at 10:10am

बढ़िया गीत है आदरणीय बृजेश जी. हार्दिक बधाई स्वीकार कीजिए. सादर.

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