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ग़ज़ल...आँख से लाली गई ना पांव से छाले गये-बृजेश कुमार 'ब्रज'

2122 2122 2122 212
दर्द दिल के आशियाँ में इस क़दर पाले गये
आँख से लाली गई ना पांव से छाले गये

रोटियों से भूख की इतनी अदावत बढ़ गई
पेट में सूखे निवाले ठूंस के डाले गये

इस क़दर उलझे हुये हैं आलम-ए-तन्हाई में
मकड़ियां यादों की चल दी भाव के जाले गये

मुफ़लिसी की आँधियाँ थीं याद के थे खंडहर
नीव भी कमजोर थी सो टूट सब आले गये

ख़्वाब की आँखों से 'ब्रज' घटती नहीं हैं दूरियां
बात दीगर है सभी पलकों तले पाले गये
(मौलिक एवं अप्रकाशित)
बृजेश कुमार 'ब्रज'

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Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on May 7, 2018 at 3:44pm

हार्दिक आभार आदरणीय त्रिपाठी जी...

Comment by Naveen Mani Tripathi on May 6, 2018 at 4:45pm

वाह 

बहुत सुंदर ग़ज़ल हुई बधाई  आपको ।

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on May 3, 2018 at 11:02pm

उत्साहवर्धन के लिए बहुत बहुत शुक्रिया आदरणीय नीलेश जी..सादर

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on May 3, 2018 at 11:01pm

स्वागत संग आभार आदरणीय मोहित जी...

Comment by Nilesh Shevgaonkar on May 3, 2018 at 11:03am

अच्छी ग़ज़ल हुई है आ. बृजेश जी..
आप  को बहुत बधाई..
सादर 

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on May 2, 2018 at 6:08pm

आभार संग नमन आदरणीय लक्ष्मण धामी जी...

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on May 2, 2018 at 4:46pm

आ. भाई ब्रजेश जी, उत्तम गजल हुई है । हार्दिक बधाई ।

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on April 30, 2018 at 9:19pm

आदरणीय समर कबीर जी आपकी टिप्पड़ी से अति प्रसन्नता का अनुभव हुआ..आपका हार्दिक आभार..स्नेह बनाये रखें

Comment by Samar kabeer on April 30, 2018 at 6:33pm

जनाब बृजेश कुमार 'ब्रज' साहिब आदाब,अच्छी ग़ज़ल हुई है,बधाई स्वीकार करें ।

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