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ग़ज़ल...पिछले कुछ दिनों से-बृजेश कुमार 'ब्रज'

फाइलातुन फाइलातुन फाइलातुन

हूँ बहुत हैरान पिछले कुछ दिनों से
ज़ीस्त है हलकान पिछले कुछ दिनों से

चाँद भी है आजकल कुछ खोया खोया
रातें हैं वीरान पिछले कुछ दिनों से

आदमी हूँ आदमी के काम आऊँ
है यही अरमान पिछले कुछ दिनों से

कौड़ियों के भाव बिकती हैं अनाएं
मर गया ईमान पिछले कुछ दिनों से

जोश में है भीड़ 'ब्रज' आक्रोश भी है
बस नहीं है जान पिछले कुछ दिनों से
(मौलिक एवं अप्रकाशित)
बृजेश कुमार 'ब्रज'

Views: 883

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Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on June 16, 2018 at 5:59pm

आदरणीय मोहित जी आपका हार्दिक आभार..सादर

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on June 16, 2018 at 5:58pm

स्वागत संग आभार आदरणीया रक्षिता जी..सादर

Comment by रक्षिता सिंह on June 15, 2018 at 3:01pm

आदरणीय बृजेश जी नमस्कार, "बस नहीं है जान पिछले कुछ दिनों से" खूबसूरत गजल के साथ  बहुत ही बेहतरीन पंक्ति ...

बहुत बहुत मुबारकबाद ...

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on June 14, 2018 at 10:15am

उत्साहवर्धन के लिए आपका आभार आदरणीय महेंद्र जी

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on June 14, 2018 at 10:14am

आभार संग नमन आदरणीय शर्मा जी

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on June 14, 2018 at 10:14am

स्वागत संग आभार आदरणीय गुमनाम जी

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on June 14, 2018 at 10:13am

हार्दिक वंदन एवं अभिनदंन आदरणीय तेजवीर सिंह जी

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on June 14, 2018 at 10:12am

बहुत बहुत आभार आदरणीय धामी जी

Comment by Mahendra Kumar on June 13, 2018 at 7:49pm

आदरणीय बृजेश जी, बहुत उम्दा ग़ज़ल कही है आपने. हर शेर बढ़िया है. हार्दिक बधाई आपको इस ख़ूबसूरत ग़ज़ल पर. सादर.

Comment by बसंत कुमार शर्मा on June 13, 2018 at 3:23pm

जोश में है भीड़ 'ब्रज' आक्रोश भी है 
बस नहीं है जान पिछले कुछ दिनों से

वाह लाजबाब गजल 

कृपया ध्यान दे...

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