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बड़ी क्षणिकायें -1--एक प्रयोग - डा० विजय शंकर

इतना तो
सब जानते हैं कि
एक रेखा को बिना काटे
छोटा करने का आसान तरीका यह है
कि उसके पास उससे बड़ी एक रेखा खींच दें ॥
आप बैठे बैठे बड़े बने रहे इसका आसान
तरीका यह है कि आप अपने पास
हमेशा अपने से छोटे लोग रखें ,
गलती से भी किसी बड़े
के सामने न आयें ॥
* * * * * * * * * * *
जीवन तो चलता है ,
करुणा , प्रेम ,दया से ,
पर हमनें उन्हें बनाया है ,
पासंगे बट्खरे जीवन के ,
सब नाप-तौल के चलाना है,
कहाँ कितनी दया दिखानी है,
कहाँ कितना-कैसा प्रेम दर्शाना है ,
मजबूरी हो तो करुणा भी बरसाना है ,
सब मूलयवान हैं सबका मूल्य चुकाना है ,
करुणा ,प्रेम,दया , दे दो, जिसका जो बनता है ,
संतुलन बना के रखो , रेट देख लो जो बनता है ॥

* * * * * * * * * * * * * * * * * * * * * * * * * * *
कोई दौड़ रहा है दो रोटियाँ पचाने के लिए
कोई दौड़ रहा है दो रोटी पाने के लिए
रोटी अपनी कीमत खूब जानती है ,
मुफ्त में तो नहीं ही मिलती है ,
मुफ्त में मिल भी जाये
तो पचाने के लिए
मेहनत मांगती है ,
उसी के रूप में
कीमत मांगती है ॥

मौलिक एवं अप्रकाशित

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Comment by Pawan Kumar on September 29, 2014 at 2:52pm

बेहतरीन क्षणिकाएँ
एक से बढ़कर एक
आदरणीय, हार्दिक बधाई!

Comment by Dr Ashutosh Mishra on September 29, 2014 at 11:19am

आदरणीय विजय सर ..आपका यह प्रयोग अच्छा लगा . चासनी में डुबोकर इशारों इशारों में बड़ी बात कह दी ..कोई दौड़ रहा है दो रोटियाँ पचाने के लिए
कोई दौड़ रहा है दो रोटी पाने के लिए
रोटी अपनी कीमत खूब जानती है ,
मुफ्त में तो नहीं ही मिलती है ,
मुफ्त में मिल भी जाये
तो पचाने के लिए
मेहनत मांगती है ..ये पंक्तिया मुझे बेहद पसंद आयीं ..रपके इस प्रयोग पर आपको हार्दिक बधाई सदर 

Comment by khursheed khairadi on September 29, 2014 at 8:23am

आदरणीय विजयशंकर जी ,बहुत अच्छा प्रयोग साथ सत्य की सशक्त अभिव्यक्ति ,आपका हृदयतल से अभिनन्दन |सादर 

Comment by Dr. Vijai Shanker on September 28, 2014 at 11:37pm
प्रिय जीतेन्द्र जी , आपको प्रयोग अच्छा लगा और रचना में सत्यता नजर आयी, दोनों के लिए बहुत बहुत धन्यवाद .
Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on September 28, 2014 at 11:12pm

सादर नमन सर , कमाल की रचना प्रस्तुत की आपने. हर एक बात चीख चीख कर सच बयां करती, बहुत बहुत बधाई आपको आदरणीय डा. विजय जी

Comment by Dr. Vijai Shanker on September 28, 2014 at 9:36pm

प्रयोग को पसंद करने एवं क्षणिकाओं की प्रशंसा के लिए बहुत बहुत धन्यवाद आदरणीय  राजेश कुमारी जी  . 

Comment by Dr. Vijai Shanker on September 28, 2014 at 9:33pm
बचपन में पढ़ा था , बिना उद्योग न कुछ होता है , न मिलता है ( विरासत छोड़ के ) शायद कुछ गहरा असर कर गया है।
आपकी प्रशंसा के लिए अनेकानेक धन्यवाद आदरणीय डॉo गोपाल नारायण जी .

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on September 28, 2014 at 7:02pm

आपका ये प्रयोग काबिले तारीफ है ..सब क्षणिकाएँ बहुत कुछ कहती हैं ..एक से बढ़कर एक ..हार्दिक बधाई आपको आ० डॉ. विजय शंकर जी  

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on September 28, 2014 at 12:46pm

विजय सर !

बेहतरीन  i  रोटी मेहनत मांगती है i खाने के लिय नहीं तो पचाने के लिये i  वाह i

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