For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

उल्फत या कि नफ़रत। (अतुकांत कविता)

सुना था मसले,
दो तरफा हुआ करते हैं,
पर हैरानगी का आलम तब हुआ कि,
जब वे अकेले ही ख़फा हो, बैठ गए।
हमने भी यह सोच कर,
ज़िक्र न छेड़ा कि,
ख़ामोशी कई मर्तबा,
लौटा ही लाती है, मुहब्बते-इज़हार,
पर अफसोस कि,
पासा ही पलट गया,
अपना तो मजमा लग गया,
और वे जो उल्फ़तों के किस्से गढ़ा करते थे,
नफ़रतों की मीनारें खड़ी करते चले गए।

मौलिक व् अप्रकाशित।

Views: 874

Comment

You need to be a member of Open Books Online to add comments!

Join Open Books Online

Comment by Usha on December 6, 2019 at 10:01am

आदरणीय समर कबीर साहब, इतनी कमज़ोर हुई मेरी रचना फिर भी आप बधाई देकर मेरा प्रोत्साहन बढ़ा रहे हैं। आपका हृदय से आभार।

(मेरे ख़याल से अभी आपको बहुत अध्यन करना है,मंच पर आई अतुकांत कविताओं का अध्यन करें ।)
- जी सर बिल्कुल, आपकी बात मान्य है।

('सुना था मसले'
इस पंक्ति में सहीह शब्द है 'मसअले')
- जी सर, भविष्य में ख़्याल रहेगा।

("पर हैरानी की बात तब हुई कि वो ख़फ़ा हो बैठे")
- अति सुन्दर।
- सर, मेरा भाव नहीं आ पाया लगता है। कहना चाहती कि खफ़ा होना किसी और को था, हो कोई और गया।

(इन पंक्तियों में 'महब्बते इज़हार' शब्द भर्ती के हैं,)
- सर, (भर्ती के हैं) नहीं समझी। मेरा भाव ये था कि कई बार चुप हो जाने से बात बढ़ती नहीं और प्रेम भाव बिना किसी गाँठ के पुनः जागृत हो जाता है।

('अपना तो मजमा लग गया')
- सर, मेरा भाव था कि तमाशा उसका बन गया जिसका कोई कुसूर ही नहीं था।

सर, आपके सभी सुझाव मान्य हैं। भविष्य में अवश्य और प्रयास की आवश्यकता है जो मैं अवश्य करुँगी, हार नहीं मानूँगी चूँकि आप जैसे गुरु का सानिध्य प्राप्त हो गया है। स्वयं को भाग्यशाली समझती हूँ। आपका हृदय से आभार। सादर।

Comment by Usha on December 6, 2019 at 9:41am

आदरणीय महेंद्र साहब, समर कबीर साहब का हर सुझाव मेरे लिए मान्य है। मैं प्रयासरत हूँ कि अच्छा कर सकूँ। इस मंच से ही सीख रही हूँ। यूँ तो मैं अंग्रेज़ी साहित्य की छात्रा व् प्राध्यापिका हूँ किन्तु हिन्दी में लिखने का प्रयास सुखद लगता है। इस मंच की कृतियों से ही सीख खुद को सीखा रही हूँ साथ ही आप सभी के सुझावों से भी। भविष्य में यकीनन अच्छा करने का प्रयास करुँगी। इतनी खामियों के बावज़ूद सकारात्मक टिप्पणी के लिए हृदय से आपका आभार। सादर।

Comment by Mahendra Kumar on December 4, 2019 at 6:17pm

आदरणीया उषा जी, अतुकान्त का अच्छा प्रयास है। कृपया आदरणीय समर कबीर सर की बातों का संज्ञान लें। हार्दिक बधाई। सादर।

Comment by Samar kabeer on November 28, 2019 at 11:03am

मुहतरमा ऊषा जी आदाब,अच्छी अतुकांत कविता लिखी आपने,बधाई स्वीकार करें ।

मेरे ख़याल से अभी आपको बहुत अध्यन करना है,मंच पर आई अतुकांत कविताओं का अध्यन करें ।

'सुना था मसले'

इस पंक्ति में सहीह शब्द है 'मसअले'

'पर हैरानगी का आलम तब हुआ कि'

इस पंक्ति में 'हैरानगी' कोई शब्द ही नहीं है ,और दूसरी बात ये कि शिल्प भी कमज़ोर है,

'जब वे अकेले ही ख़फा हो, बैठ गए'

अरे भाई जब कोई ख़फ़ा होता है तो किसी को साथ लेकर थोड़े ही ख़फ़ा होता है,इस पूरी पंक्ति को यूँ होना था:-

"पर हैरानी की बात तब हुई कि वो ख़फ़ा हो बैठे"

'हमने भी यह सोच कर,
ज़िक्र न छेड़ा कि,
ख़ामोशी कई मर्तबा,
लौटा ही लाती है, मुहब्बते-इज़हार'

इन पंक्तियों में 'महब्बते इज़हार' शब्द भर्ती के हैं,

'अपना तो मजमा लग गया'

इस पंक्ति में 'मजमा' शब्द का क्या अर्थ लिया है आपने?

Comment by Usha on November 27, 2019 at 6:52pm
आदरणीय प्रदीप सर, ह्रदय से आपका आभार। सादर ।
Comment by Usha on November 27, 2019 at 6:51pm
आदरणीय डॉ गीता चौधरी जी, ह्रदय से आपका आभार । सादर ।
Comment by प्रदीप देवीशरण भट्ट on November 27, 2019 at 6:39pm

बेहतरीन ख्याल, बधाई उषा जी

Comment by Dr. Geeta Chaudhary on November 27, 2019 at 10:22am

आदरणीय उषा जी, सुंदर कविता के लिए बहुत बधाई आपको।

Comment by Usha on November 27, 2019 at 8:18am

आदरणीय लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' सर, आपको मेरी कविता पसंद आयी। प्रसन्नता हुई। आपका हृदय से आभार। सादर।

Comment by Usha on November 27, 2019 at 8:17am

आदरणीय विजय शंकर सर , (उल्फत, नफ़रत, और किसी किसी की अपनी अपनी फितरत) इन शब्दों ने मुझे और नए भावों को मह्सूस करने का मौका दे दिया। प्रोत्साहित करने के लिए आपका धन्यवाद। आभार। सादर।

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Blogs

Latest Activity

Sheikh Shahzad Usmani replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-128 (विषय मुक्त)
"सादर नमस्कार। पति-पत्नी संबंधों में यकायक तनाव आने और कोर्ट-कचहरी तक जाकर‌ वापस सकारात्मक…"
25 minutes ago
Sheikh Shahzad Usmani replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-128 (विषय मुक्त)
"आदाब। सोशल मीडियाई मित्रता के चलन के एक पहलू को उजागर करती सांकेतिक तंजदार रचना हेतु हार्दिक बधाई…"
31 minutes ago
Sheikh Shahzad Usmani replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-128 (विषय मुक्त)
"सादर नमस्कार।‌ रचना पटल पर अपना अमूल्य समय देकर रचना के संदेश पर समीक्षात्मक टिप्पणी और…"
38 minutes ago
Sheikh Shahzad Usmani replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-128 (विषय मुक्त)
"आदाब।‌ रचना पटल पर समय देकर रचना के मर्म पर समीक्षात्मक टिप्पणी और प्रोत्साहन हेतु हार्दिक…"
41 minutes ago
Dayaram Methani replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-128 (विषय मुक्त)
"आदरणीय शेख शहज़ाद उस्मानी जी, आपकी लघु कथा हम भारतीयों की विदेश में रहने वालों के प्रति जो…"
1 hour ago
Dayaram Methani replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-128 (विषय मुक्त)
"आदरणीय मनन कुमार जी, आपने इतनी संक्षेप में बात को प्रसतुत कर सारी कहानी बता दी। इसे कहते हे बात…"
1 hour ago
AMAN SINHA and रौशन जसवाल विक्षिप्‍त are now friends
1 hour ago
Dayaram Methani replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-128 (विषय मुक्त)
"आदरणीय मिथलेश वामनकर जी, प्रेत्साहन के लिए बहुत बहुत धन्यवाद।"
1 hour ago

सदस्य कार्यकारिणी
मिथिलेश वामनकर replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-128 (विषय मुक्त)
"आदरणीय Dayaram Methani जी, लघुकथा का बहुत बढ़िया प्रयास हुआ है। इस प्रस्तुति हेतु हार्दिक…"
3 hours ago

सदस्य कार्यकारिणी
मिथिलेश वामनकर replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-128 (विषय मुक्त)
"क्या बात है! ये लघुकथा तो सीधी सादी लगती है, लेकिन अंदर का 'चटाक' इतना जोरदार है कि कान…"
3 hours ago

सदस्य कार्यकारिणी
मिथिलेश वामनकर replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-128 (विषय मुक्त)
"आदरणीय Sheikh Shahzad Usmani जी, अपने शीर्षक को सार्थक करती बहुत बढ़िया लघुकथा है। यह…"
3 hours ago
Dayaram Methani replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-128 (विषय मुक्त)
"लघुकथा गोष्ठी" अंक-128 शीर्षक — वापसी आज कोर्ट में सूरज और किरण के तलाक संबंधी केस का…"
5 hours ago

© 2025   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service