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यह सियासत आप पर हम पर कहर होने को है

2122 2122 2122 212

पग सियासी आँच पर मधु भी जहर होने को है।
बच गया ईमान जो कुछ दर-ब-दर होने को है।।

मुफलिसों को छोड़कर गायों गधों पर आ गई।
यह सियासत आप पर हम पर कहर होने को है।।

उड़ रहा है जो हकीकत की धरा को छोड़ कर।
बेखबर वो जल्द ही अब बाखबर होने को है।।

वो जो बल खा के चलें इतरा के घूमें कू-ब-कू।
खत्म उनके हुस्न की भी दोपहर होने को है।।

जुल्म से घबरा के थक के हार के बैठो न तुम।

"हो भयावह रात कितनी भी सहर होने को है॥"


आशीष यादव
मौलिक एवम् अप्रकाशित

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Comment by आशीष यादव on March 4, 2017 at 8:13pm

आदरणीय Raghav Priydarshi जी शे'र पसंद आया मैं धन्य हुआ। बहुत बहुत आभार |

Comment by आशीष यादव on March 4, 2017 at 8:11pm

आदरणीय amod srivastav (bindouri) जी बहुत बहुत आभार ।

Comment by Mohammed Arif on March 4, 2017 at 2:40pm
आदरणीय आशीष यादव जी आदाब,बेहतरीन, व्यंग्यात्मक ग़ज़ल । शे'र दर शे'र दाद के साथ मुबारकबाद ।
Comment by नाथ सोनांचली on March 4, 2017 at 6:09am
आद0 आशीष यादव जी सादर अभिवादन। बहुत ही उम्दा समसामयिक राजनितिक कटाक्ष का समावेश करती गजल, सभी अशआर अत्यंत ही अर्थपूर्ण। इस शेर ने तो हकीकत ही बयां कर दी।
मुफलिसों को छोड़कर गायों गधों पर आ गई।
यह सियासत आप पर हम पर कहर होने को है।।
Comment by JAWAHAR LAL SINGH on March 3, 2017 at 8:57pm

बहुत ही शानदार जानदार और व्यंग्यदार रचना हुई है आदरणीय आशीष यादव जी!

Comment by Dr Ashutosh Mishra on March 3, 2017 at 8:47pm
आदरणीय आशीष जी उम्दा ग़ज़ल हुयी है इस भयावह रात की भी सहर होने को है इसमें बहर देख लीजियेगा भी के बाद हार्दिक बढ़ायी के साथ
Comment by Gurpreet Singh jammu on March 3, 2017 at 8:46pm
बहुत अच्छी गज़ल आदरणीय आशीश जी..गज़ल के आखरी मिसरे में कुछ मिसिंग लग रहा है..
Comment by amod shrivastav (bindouri) on March 3, 2017 at 5:18pm
वह्ह्ह्ह

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