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ग़ज़ल :- हज़रत-ए-'मीर' की ज़मीन में

फाइलातुन मफाइलुन फेलुन / फइलुन / फेलान

चैन इस दिल को कब नहीं आता
बाम पर चाँद जब नहीं आता

ख़ुश मिज़ाजी हमारा शैवा है
हमको गैज़-ओ-ग़ज़ब नहीं आता

सब हैं सैराब आपके दर से
एक भी तिश्ना लब नहीं आता

नामा उनका लिये हुए क़ासिद
पहले आता था अब नहीं आता

तल्ख़ लहजा मिरा मुआफ़ करें
बे अदब हूँ अदब नहीं आता

'मीर' साहिब,ग़ज़ल कही लेकिन
शैर कहने का ढब नहीं आता

ज़िक्र तेरा "समर" करेंगें वो
नाम भी ज़ेर-ए-लब नहीं आता

समर कबीर
मौलिक / अप्रकाशित

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Comment by जयनित कुमार मेहता on February 9, 2016 at 9:09pm
लाजवाब ग़ज़ल के लिए दाद क़ुबूल फरमाएं जनाब समर कबीर साहब।।
Comment by Rahila on February 9, 2016 at 4:33pm
वाह...आदरणीय समर सर जी! बहुत शानदार ग़ज़ल हुई।आपको इस प्रस्तुति के लिये ढेरों बधाई ।सादर
Comment by Samar kabeer on February 9, 2016 at 2:51pm
जनाब निलेश 'नूर'साहिब आदाब,ग़ज़ल में शिर्कत और सुख़न नवाज़ी के लिये शुक्र गुज़ार हूँ !
Comment by Samar kabeer on February 9, 2016 at 2:48pm
आली जनाब डॉ.विजय शंकर जी आदाब,ग़ज़ल में शिर्कत और सुख़न नवाज़ी के लिये शुक्र गुज़ार हूँ !
Comment by Samar kabeer on February 9, 2016 at 2:45pm
जनाब मिथिलेश वामनकर जी आदाब,ग़ज़ल में शिर्कत और सुख़न नवाज़ी के लिये शुक्र गुज़ार हूँ !
आपके और नादिर ख़ान साहिब के मार्गदर्शन के बाद त्रुटियाँ दुरुस्त कर ली हैं,धन्यवाद !
Comment by Nilesh Shevgaonkar on February 9, 2016 at 8:43am

पहले आता था...अब नहीं आता...वाह वाह वाह और वाह ..क्या बात है..बहुत बहुत बधाई 

Comment by Dr. Vijai Shanker on February 9, 2016 at 2:23am
आदरणीय समर कबीर साहब, नमस्कार , बहुत खूबसूरत ग़ज़ल प्रस्तुत हुयी है , बहुत बहुत बधाई , सादर।

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on February 9, 2016 at 1:37am

वाह वाह वाह... आदरणीय समर कबीर जी, कमाल की ग़ज़ल कही है आपने. दिल खुश हो गया पढ़कर. इस शानदार और लाजवाब ग़ज़ल पर शेर दर शेर दाद ओ मुबारकबाद कुबूल फरमाएं.

देवनागरी अनुसार इन शब्दों की वर्तनी सम्बन्धी निवेदन है - 

ऐक-एक 

बै अदब- बे अदब 

Comment by Samar kabeer on February 8, 2016 at 9:59pm
जनाब नादिर ख़ान जी,आदाब,ग़ज़ल में शिर्कत और सुख़न नवाज़ी के लिये आपका तहे दिल से शुक्रगुज़ार हूँ ,कहाँ कहाँ टाइपिंग मिस्टेक हुई है,कृपया बताने का कष्ट करें ताकि मैं उसे दुरुस्त कर सकूँ ।
Comment by नादिर ख़ान on February 8, 2016 at 6:39pm

आदरणीय समीर साहब, हमेशा की तरह खूबसूरत ग़ज़ल से आपने मंच को नवाज़ा है, बहुत मुबारकबाद आपको
कुछ जगह टाइपिंग मिस्टेक दिखाई पड़ रही है कृपया देख लिजिएगा। ....

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