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सूखी हुई है आज मगर इक नदी है तू...( ग़ज़ल :- सालिक गणवीर)

221 2121 1221 212

सूखी हुई है आज मगर इक नदी है तू
मैं जानता हूँ रेत के नीचे दबी है तू

मरना है एक दिन ये नई बात भी नहीं
जी लूँ ऐ ज़िंदगी तुझे जितनी बची है तू

आँखों को चुभ रही है अभी तेरी रौशनी
काँटा समझ रहा था मगर फुलझड़ी है तू

ऐ मौत कोई दूसरा दरवाजा खटखटा
आवाज़ मेरे दर पे ही क्यों दे रही है तू

हर बार ये लगा है तुझे जानता हूँ मैं
महसूस भी हुआ है कभी अजनबी है तू

आज़ाद हो रही हैं ये शह्रों की लड़कियाँ
खूँटे से गाँव में तो अभी तक बँधी है तू

साबित किया है तूने सुलह कर के बारहा
हर बार मैं ग़लत हूँ हमेशा सही है तू

* मौलिक एवं अप्रकाशित.

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Comment by सालिक गणवीर on September 29, 2020 at 11:23pm

प्रिय रुपम
सादर अभिवादन
ग़ज़ल पर आपकी उपस्थिती और सराहना के लिए ह्रदय तल से आपका आभारी हूँ.

Comment by सालिक गणवीर on September 29, 2020 at 11:22pm

बहन डिंपल शर्मा जी
सादर अभिवादन
ग़ज़ल पर आपकी उपस्थिती और सराहना के लिए ह्रदय तल से आपका आभारी हूँ.

Comment by सालिक गणवीर on September 29, 2020 at 11:17pm

आदरणीय चेतन प्रकाश जी.
सादर अभिवादन
ग़ज़ल पर आपकी उपस्थिती और सराहना के लिए ह्रदय तल से आपका आभारी हूँ.सुझाव पर तामील शीघ्र होगी मुुुहतरम.

Comment by सालिक गणवीर on September 29, 2020 at 11:13pm

आदरणीय निलेश 'नूर' साहब
सादर अभिवादन
ग़ज़ल फर आपकी आमद और सराहना के लिए हार्दिक आभार. कमियों पर ध्यानाकर्षित करने के लिये अलग से शुक्रिय:.सभी गुणीजनों की इस्लाह के बाद सारे सुझावों पर तामील संभावित है. एक और शैर कहा है..
हर बार ये लगा कि तुझे जानता हूँ मैं
महसूस क्यों हुआ है अभी अजनबी है तू
सादर.टिप्पणी अपेक्षित है.

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on September 29, 2020 at 8:00pm

आ. भाई सालिक गणवीर जी, सादर अभिवादन । बेहतरीन गजल हुई है । हार्दिक बधाई । शेष छिटपुट कमियों के बार नीलेश भाई कह ही चुके हैं । सादर..।

Comment by Nilesh Shevgaonkar on September 29, 2020 at 9:32am

आ. सालिक साहब,

अच्छी ग़ज़ल हुई है। बधाई।

चौथे शेर में मिरे लिख कर बहर तोड़ दी आपने।

पाँचवें शेर का मतलब समझ नहीं सका मैं।

अन्तिम शेर में तुम और तू आने से शुतुरगुरबा हो रहा है।

देखियेगा।

सादर

Comment by Chetan Prakash on September 29, 2020 at 7:01am

बढिया साफ सुथरी गज़ल हुई है, बंधुवर सालिक गणवीर महोदय, नाचीज़ की बधाई स्वीकार करें। बस एक जगह तीसरे शेर के सानी मिसरे के पहले हिस्से आप मुझे चूकते दिखाई दिए,
आवाज़ "मिरे दर पे" ( 1 2 2 ), मेरी अल्प बुद्धि से "मेरे दर पे" होना चाहिए। इति

Comment by Dimple Sharma on September 29, 2020 at 5:49am

आदरणीय सालिक गणवीर जी नमस्ते, ख़ूबसूरत ग़ज़ल पर बधाई स्वीकार करें आदरणीय।

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