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ग़़ज़़ल- फोकट में एक रोज की छुट्टी चली गई

बह्र - मफऊल फाइलात मफाईल फाइलुन
221 2121 1221 212

अन्धों के गांव में भी कई बार ख्वामखाह
करती है रोज रोज वो ऋंगार ख्वामखाह

रिश्ता नहीं है कोई भी उससे तो दूर तक
मुजरिम का बन गया है तरफदार ख्वामखाह

फोकट में एक रोज की छुट्टी चली गई
इतवार को ही पड़ गया त्यौहार ख्वामखाह

नाटक में चाहते थे मिले राम ही का रोल
रावण का मत्थे मढ़ गया किरदार ख्वामखाह

ये बुद्ध की कबीर की चिश्ती की है जमीन
फिर आप भाँजते हैं क्यूँ तलवार ख्वामखाह

खबरे बढ़ा चढ़ा के दिखाना है इनका काम
तिल का बना दें ताड़ ये अखबार ख्वामखाह

खारों से मेरी कोई अदावत न थी मगर
पैरों मे चुभ गये हैं मेरे खार ख्वामखाह

मौलिक अप्रकाशित अप्रसारित

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Comment by Ram Awadh VIshwakarma on May 26, 2020 at 4:25pm

आदरणीय समर कबीर साहब.आदाब। सटीक टिप्पपणी के लिए आभार। जनाब अमीरुद्दीन खान साहब के अनुसार खामखा रदीफ में ले सकते हैं?

Comment by Ram Awadh VIshwakarma on May 26, 2020 at 4:21pm

आदरणीय अमीरुद्दीन खान साहब आदाब। खामखा के कई शब्द नेट पर होने से मुझे भ्रम हो गया था। आपने खाम ख्वाह बताकर कृपा की धन्यवाद।

गया में य का वज्न गिरा देने से मेरे विचार से 11 गणना की जानी चाहिए।

Comment by Ram Awadh VIshwakarma on May 26, 2020 at 4:00pm
  • आदरणीय विनय कुमार जी शेर की तारीफ करने एवं हौसलाअफजाई के लिए तहेदिल से शुक्रिया
Comment by Samar kabeer on May 26, 2020 at 2:45pm

जनाब राम अवध जी आदाब, ग़ज़ल का प्रयास अच्छा है,लेकिन रदीफ़ ग़लत हो गई वज़्न के लिहाज़ से,सहीह शब्द "ख़्वाह मख़्वाह'21121,इस शब्द को 'ख़ाह मख़ाह' भी लिख सकते हैं,कुछ मिसरों के अंत में एक साकिन की छूट इस बह्र में सहीह है,बहरहाल इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें ।

Comment by अमीरुद्दीन 'अमीर' बाग़पतवी on May 26, 2020 at 1:02pm

जनाब राम अवध विश्वकर्मा जी, आदाब। ग़ज़ल का अच्छा प्रयास है। बधाई स्वीकार करें।

कुछ कमियों की तरफ़ जो क़ाबिल ए मरम्मत हैं, आप को तवज्जो दिलाना चाहूंगा। 

रदीफ़ में जो लफ़्ज़ लिया गया है उस का सहीह हिज्जे 'ख़ामख़्वाह' है ये लफ़्ज़ फ़ारसी ज़बान से अख़्ज़ किया गया है। इस के इलावा 

इस लफ़्ज़ की वजह से और दो जगह और कुल दस जगह ग़ज़ल में साकिन की छूट ली गयी है जो मुनासिब नहीं है। ध्यान रहे ये छूट है नियम नहीं है। 

उर्दू ज़बान में इस लफ़्ज़ का मुख़फ़्फ़िफ़ लफ़्ज़ ख़ामख़ा भी है जिस के इस्तेमाल से आप आठ जगह छूट लेने से बच सकते हैं। 

इतवार को ही पड़ गया त्यौहार ख्वामखाह.   और 

रावण का मत्थे मढ़ गया किरदार ख्वामखाह   ये दोनों मिसरे बह्र में नहीं हैं, इन मिसरों में शामिल लफ़्ज़ 'गया' को 1 1 पर नहीं ले सकते हैं। सादर। 

Comment by विनय कुमार on May 26, 2020 at 12:11pm

//ये बुद्ध की कबीर की चिश्ती की है जमीन
फिर आप भाँजते हैं क्यूँ तलवार ख्वामखाह//, लाजवाब शेर है, बहुत बहुत बधाई आ राम अवध विश्वकर्मा जी 

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