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समय के दोहे -लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

पतझड़ छोड़ वसन्त में,  उग जाते हैं शूल
जीवन में रहता नहीं, समय सदा अनुकूल।१।
*
सावन सूखा  बीतता, कभी  डुबोता जेठ
बिना भूल के भी समय, देता कान उमेठ।२।
*
करते सुख की कामना, मिलते हैं आघात
जब बोते  सूखा  पड़े, पकने  पर बरसात।३।
*
अनचाही जो हो दशा, दुखी न होना मीत
देना  मुट्ठी  बंद  ही, रही  समय  की  रीत।४।
*
रहा निराला ही सदा, यहाँ समय का खेल
जीवन कटे बिछोह में, मरण कराता मेल।५।
*
छुरी बगल में मीत के, दुश्मन के कर फूल
कैसे -कैसे साथ रख, चलता समय उसूल।६।
*
लाखों भेजे झट  कभी, तट  पर देने साथ
और कभी मझधार में, समय छुड़ा दे हाथ।७।
*
मोती जिसने काल के, कहते रखे सँभाल।
होने  देता  है  नहीं, कभी  समय  कंगाल।८।
*
धनवानों की नींद हर, भरता नित भंडार
निर्धन को कंगाल  कर, देता नींद अपार।९।
*
समय नहीं है बोलता, करो समय का मान
सीख समय पर ये स्वयं, है पुरखों का ज्ञान।१०।
****
मौलिक/अप्रकाशित
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

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Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on September 17, 2024 at 9:53pm

आ. भाई श्यामनाराण जी, सादर अभिवादन।दोहों पर उपस्थिति और उत्साहवर्धन के लिए हार्दिक आभार।

Comment by Shyam Narain Verma on September 16, 2024 at 2:05pm
नमस्ते जी, बहुत ही सुंदर और ज्ञान वर्धक प्रस्तुति, हार्दिक बधाई l सादर

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