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लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर''s Blog (195)

दुख बयानी है गजल - लक्ष्मण धामी "मुसाफिर"

२१२२/२१२२/२१२२/२१२

अब न केवल प्यार की ही दुख बयानी है गजल

भूख गुरबत जुल्म की भी अब कहानी है गजल।१।



कल तलक लगती रही जो बस गुलाबों का बदन

अब पलाशों की  उफनती  धुर जवानी है गजल।२।



वो जमाना और था जब जुल्फ लब की थी कथा

माँ पिता के प्यार की  भी  अब निशानी है गजल।३।



पंछियों की चहचहाहट  फूल की मुस्कान भी

गीत गाती एक नदी की ज्यों रवानी है…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on October 14, 2018 at 3:30pm — 23 Comments

गजल कहें - लक्ष्मण धामी "मुसाफिर"

२२१/२१२१/ १२२१/२१२



दिल से चिराग दिल का जलाकर गजल कहें

नफरत का तम जहाँ से मिटाकर गजल कहें।१।



पुरखे  गये   हैं   छोड़   विरासत   हमें   यही

रोते  हुओं  को   खूब  हँसाकर  गजल  कहें।२।



कोई न कैफियत है अभी जलते शहर को

आओ धधकती आग बुझाकर गजल कहें।३।



रखता नहीं  वजूद  ये  वहशत  का देवता

सोया जमीर खुद का जगाकर गजल कहें।४।



बैठा दिया दिलों में सियासत ने…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on October 8, 2018 at 6:34am — 14 Comments

जीवन में लड़ाते हैं क्यों यार गड़े मुर्दे - गजल

२२१/१२२२/२२१ /१२२२



इस द्वार  गड़े  मुर्दे  उस  द्वार गड़े मुर्दे

जीवन में लड़ाते हैं क्यों यार गड़े मुर्दे।१।



हर बार नया  मुद्दा  पैदा तो नहीं होता

देते हैं  सियासत  को  आधार गड़े मुर्दे।२।



मौसम है चुनावी क्या राहों में खड़ा यारो

लेने जो  लगे  हैं  फिर  आकार  गड़े मुर्दे।३।



भाता नहीं जिनको भी याराना जमाने में

लड़ने  को  उखाड़ेंगे  दो  चार  गड़े  मुर्दे ।४।…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on September 20, 2018 at 10:00am — 16 Comments

क्या मन है बीमार पड़ौसी - गजल - लक्ष्मण धामी "मुसाफिर"

२२२२/२२२२



खाता क्यों है खार पड़ौसी

क्या मन है बीमार पड़ौसी।१।



इतनी जल्दी भूल गया क्यों

बचपन के हम यार पड़ौसी।२।



सच जाने पर खूब करे क्यों

बेमतलब  तकरार  पड़ौसी।३।



जो कहना है सम्मुख कह दे

मत कर  पीछे  वार पड़ौसी।४।



जबरन हम तो नहीं घुसेंगे

क्यों ढकता है द्वार पड़ौसी।५।



लड़ना भिड़ना पागलपन है

इसमें सब की हार…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on September 19, 2018 at 12:02am — 16 Comments

बरबादियाँ ही सब तरफ आती हैं इससे बस - गजल

221 2121 222 1212



हाकिम ही  देश लूट के जब यूँ  फरार हो

ऐसे में किस पे किस तरह तब ऐतबार हो।१।



रूहों का दर्द बढ़ के जब जिस्मों को आ लगे

बातों  से  सिर्फ  बोलिए  किसको  करार हो।२।



इनकी तो रोज ऐश  में  कटती है खूब अब

क्या फर्क इनको रोज ही जनता शिकार हो।३।



हर शख्श जब तलाश में अवसर की लूट के

हालत में देश की  भला  फिर क्या सुधार हो ।४।



मुट्ठी में सबको चाहिए पलभर में चाँद भी

मंजिल के  बास्ते  किसे  तब  इन्तजार हो…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on September 13, 2018 at 4:56am — 13 Comments

मालिक वतन के  भूख  से - गजल - लक्ष्मण धामी "मुसाफिर"

२२१/ २१२१ /२२२/१२१२

हर शख्स जो भी दूर से भोंदू दिखाई दे

देखूँ करीब से  तो  वो  चालू  दिखाई दे।१।



अब तो हवा भी कत्ल का सामान हो रही

लाज़िम नहीं कि  हाथ  में चाकू दिखाई दे।२।



मालिक वतन के  भूख  से  मरते रहे यहाँ

सेवक की तस्तरी में नित काजू दिखाई दे।३।



सच तो यही कि जग में है मन से फकीर जो

सोना  भी  उसको  दोस्तो  बालू  दिखाई दे।४।…



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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on September 10, 2018 at 9:01pm — 6 Comments

शिक्षक दिवस के दोहे - लक्ष्मण धामी "मुसाफिर"

शिक्षक दिवस के दोहे



बनते शिष्य महान तब, शिक्षक अगर महान

शिक्षक बिन हर इक रहा, अधकचरा इन्सान।१।



जिसने जीवन  भर किया, शिक्षक  का सम्मान

जग ने उसका  है  किया, इत उत  बड़ा बखान।२।



शिक्षक थोड़ा  सा  अगर,  दे  दे जो उत्साह

भटका बालक चल पड़े, सदा सत्य की राह।३।



पथ की बाधा नित हरी, जिसने राह बुहार

दे थोड़ा सा मान कर, शिक्षक का आभार।४।…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on September 4, 2018 at 9:00pm — 9 Comments

कोई देकर गया था इक खुशी यारो - गजल (लक्ष्मण धामी "मुसाफिर" )

१२२२/१२२२/१२२२

मुहब्बत भी कहानी हो गयी हमसे

बहुत बद ये जवानी हो गयी हमसे।१।



कोई देकर गया था इक खुशी यारो

कहीं गुम वो निशानी हो गयी हमसे।२।



जमाना सारा ही  दुश्मन हुआ है यूँ

जरा सी सच बयानी हो गयी हमसे।३।



कसक सी दिल में उठ्ठी है कहीं यारो

किसी से बद जबानी हो गयी हमसे।४।



भला यूँ कम कहाँ हम थे मगर अब तो

ये दुनिया  भी  सयानी  हो …

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on August 27, 2018 at 9:55am — 10 Comments

अबतक तो बस तन्हा हूँ - गजल ( लक्ष्मण धामी मुसाफिर)

२२ २२ २२ २



पूछ न इस  रुत कैसा हूँ

अबतक तो बस तन्हा हूँ।१।



बारिश तेरे  साथ गयी

दरिया होकर प्यासा हूँ।२।



आता जाता एक नहीं

मैं भी  कैसा  रस्ता हूँ।३।



जब तन्हाई डसती है

सारी रात भटकता हूँ।४।



हाथों में  चुभ  जाते हैं

काँटे जो भी चुनता हूँ।५।



जाने कौन चुनेगा अब

उतरन वाला कपड़ा हूँ।६।



तारों सँग कट जाती है

शरद अमावस रैना हूँ।७।



अनमोल भले बेकार…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on August 21, 2018 at 11:57am — 18 Comments

कुछ दोहे -लक्ष्मण धामी"मुसाफिर"

सुखिया को संसार में, सब कुछ मिलता मोल

पर दुखिया  के  वास्ते, सकल  जिन्दगी झोल।१।

हर देहरी  पर  चाह  ले, आँगन बैठे लोग

भूखों को दुत्कार नित, मंदिर मंदिर भोग।२।



पाले  कैसी  लालसा, हर  मानव मजबूर

हुआ पड़ोसी पास अब, सगा सहोदर दूर।३।



बिकने को कोई बिके, पर ये दुख का योग

औने-पौने  बिक  रहे, ऊँचे  कद  के  लोग।४।



घुट्टी में सँस्कार की, अब क्या क्या खास

रिश्तों से आने लगी, अब जो खट्टी बास।५।

मौलिक व…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on August 19, 2018 at 5:28pm — 12 Comments

होती नहीं  है भोर - लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

२२१ २१२१ २२२  १२१२



कहते  नहीं  हैं  आपसे  रस्ता  सुझाइये

राहों में  यूँ  न   देश  की  रोड़ा लगाइये।१।



आता है भेड़िया तो कुछ हरकत दिखाइये

कमजोर गर  ये  हाथ  हैं  हल्ला  मचाइये।२।



कहते हो दूसरों की  है  सूरत अगर मगर

खुद को भी रोशनी में ये दर्पण दिखाइये।३।



होती नहीं  है भोर इक सूरज उगे से ही

गर देखनी हो भोर तो खुद को जगाइये।४।



बातों को दिल की रोज  ही ऐ …

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on July 7, 2018 at 12:00pm — 13 Comments

रहमत में हरम मागा- लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

२२१ १२२२ २२१ १२२२



जितना भी सनम माँगा यूँ हमने है कम माँगा

मरने की नहीं हिम्मत जीने का ही दम माँगा।१।



होते ही सवेरा  नित  साया  भी डराता है

घबरा के उजाले से यूँ रात का तम माँगा।२।



सुनते हैं सभी कहते कम अक्ल हमें लेकिन

खुशियों में अकेले थे इस बात से गम माँगा।३।



चौपाल से बढ़ शायद महफूज लगा हो कुछ

ऐसे  ही  नहीं  उसने  रहमत  में  हरम माँगा।४।



ऐसे ही  नहीं  शबनम  पड़  जाती है रातों को

धरती का रह इक कोना…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on July 5, 2018 at 6:30am — 16 Comments

कैसे अजब हैं लोग जो - लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

२२१ /२१२१ /२२२  /१२१२

खासों से बढ़ के  खास यूँ होते हैं आम भी

जिसने समझ लिया उसे मिलते हैं राम भी।१।



कैसे अजब हैं लोग जो कहते हैं यार ये

बदनामियों के साथ ही होता है नाम भी।२।



आती है जिसको भोर यूँ झट से अगर कहीं

ढलती है  उसकी  दोस्तो  ऐसे ही शाम भी।३।



अभिषेक हो रहा है अब सुनते शराब से

करने लगी हवस पतित देवों का धाम भी।४।



जब से गमों …

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on July 3, 2018 at 7:35pm — 21 Comments

कैसे करता है ये निर्धन भी गुजारा देखो - तरही गजल ( लक्ष्मण धामी "मुसाफिर"

2122     1122      1122     22



तम की रातों में कहीं दूर उजाला देखो

डूबती नाव को तिनके का सहारा देखो।१।



दिन जो तपता हो तो रोओ न उसे तुम ऐसे

धूप कोमल सी हो जिसमें वो सवेरा देखो।२।



कहने वालों ने कहा है कि ये दुनिया घर है

हो मयस्सर तो कभी घूम के दुनिया देखो।३।



आप हाकिम हो रहो दूर तरफदारी से

न्याय के हक में न अपना न पराया देखो।४।



सिर्फ कुर्सी की सियासत में रहो मत डूबे

कैसे करता है ये…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on June 8, 2018 at 7:00pm — 18 Comments

नदिया  पोखर सब सूखे - गजल ( लक्ष्मण धामी " मुसाफिर"

२२२२ २२२२ २२२२ २२२



पोथा पढ़ना पंडित  भूले  शुभ मंगल  में आग लगी

जो माथे को शीतल करता उस संदल में आग लगी।१।



जहर  भरा  है  खूब हवा  में  हर मौसम दमघोटू  है

पंछी अब क्या घर लौटेंगे जिस जंगल में आग लगी।२।



कैसी  नफरत  फैल  गयी  है  बस्ती  बस्ती  देखो तो

जिसकी छाँव तले सब खेले उस पीपल में आग लगी।३।



धन दौलत  की  यार पिपासा  इच्छाओं का कत्ल करे

चढ़ते यौवन जिसकी चाहत उस आँचल में आग लगी।४।



किस्मत फूटी है हलधर की नदिया  पोखर सब…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on June 6, 2018 at 4:55pm — 20 Comments

मातृ दिवस पर दोहे - लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'



घर को घर सा कर रखे, माँ का अनुपम नेह

बिन माँ  के  भुतहा लगे, चाहे  सज्जित गेह।१।



माँ ही जग का मूल  है, माँ  से ही हर चीज

माता ही धारण करे, सकल विश्व का बीज।२।



सुत के पथ में फूल रख, चुन लेती हर शूल

हर चंदन से बढ़ तभी, उसके पग की धूल।३।



शीतल सुखद बयार बन, माँ हरती सन्ताप

जिसको माँ का ध्यान हो, करे नहीं वो पाप।४।



रखे  कसौटी  पाँव  को, कंटक  बो  संसार

करे सरल  हर …

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on May 13, 2018 at 7:30am — 8 Comments

नेता जी - दोहे -लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'



बढ़ते ही नित जा रहे, खादी पर अब दाग

नेता जी तो सो रहे, जनता तू तो जाग।१।



जन सेवा की भावना, आज बनी व्यापार

चाहे केवल लाभ को, कुर्सी पर अधिकार।२।



मालिक जैसा ठाठ ले, सेवक रखकर नाम

देश तरक्की का भला, कैसे हो फिर काम।३।



नेता जी की चाकरी, तन्त्र करे नित खूब

किस्मत में यूँ देश की, आज जमी है दूब।४।



मुखर हुए निज स्वार्थ हैं, गौंण हो गया देश

नेता खुद  में  मस्त  हैं, क्या  बदले परिवेश।५।



जाति धर्म तक हो गये, सीमित नेता…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on May 6, 2018 at 3:30pm — 10 Comments

मजदूर के दोहे - लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर



करे सुबह से शाम तक, काम भले भरपूर।

निर्धन का निर्धन रहा, लेकिन हर मजदूर।१।



कहने को सरकार ने, बदले बहुत विधान।

शोषण से मजदूर का, मुक्त कहाँ जहान।२।



हरदम उसकी कामना, मालिक को आराम।

सुनकर  अच्छे  बोल दो, करता  दूना काम।३।



वंचित अब भी खूब है, शिक्षा से मजदूर।

तभी झेलता रोज ही, शोषण हो मजबूर।४।



आँधी  वर्षा या  रहे, सिर  पर  तपती धूप।

प्यास बुझाने के लिए, खोदे हर दिन कूप।५।



पी लेता दो घूँट मय, तन जब थककर…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on May 1, 2018 at 7:39pm — 13 Comments

मूर्ख दिवस के दोहे - लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर

सूँघा हमने फूल को, महज समझ कर फूल

था कागज का तो मना, अपना 'अप्रैल फूल'।१।



हम में  दस  ही  मूर्ख हैं, नब्बे  हैं  हुशियार

लेकिन ये दस कर रहे, हर दुख का उपचार।२।



मूरख कब देता भला, मूर्ख दिवस को मान

 इस पर कृपा कर रहा, सहज भाव विद्वान।३।



भोले भाले का उड़ा, खूब कुटिल उपहास

मूर्ख दिवस पर सोचते, वो हैं खासमखास।४।



दसकों से सर पर रहा, बेअक्लों  का…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on April 1, 2018 at 7:28am — 20 Comments

कविता दिवस के दोहे

कविता कोरी कल्पना, कविता मन का रूप

कविता को कवि ले गया, जहाँ न पहुँचे धूप।१।



किसी फूल की पंखुड़ी, किसी कली का गाल

कविता  रंगत  प्यार की, नहीं शब्द  का जाल।२।



आँचल में रचती रही, सुख दुख कविता रोज

पड़ी जरूरत जब कभी, भरती सब में ओज।२।



भूखों की ले भूख जब, दुखियों की ले पीर

कविता सबकी तब भरे, आँखों में बस नीर।४।



युगयुग से भाये नहीं, कविता को अनुबंध

हवा  सरीखी  ये बहे, लिए  अनौखी  गंध।५।



कविता सुख की थाल तो, है…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on March 21, 2018 at 3:30pm — 12 Comments

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