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लोक को बाँटा है ऐसे इस सियासत ने यहाँ (गजल)-लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

कोई भी  नेता  हमारा  वादे  का  सच्चा नहीं
घोषणा करता मगर कुछ लोक को देना नहीं।१।
*
हर बहस के पीछे केवल कुर्सियों की टीस है
शेष सन्सद में हमारे  हित  कोई झगड़ा नहीं।२।
*
बस चुनावी वक्त  में  ही  रात दिन चर्चा में हम
शेष वर्षों में हमीं को उन का दिल धड़का नहीं।३।
*
लोक को बाँटा है ऐसे इस सियासत ने यहाँ
भीड़ में भी बोलिए तो कौन अब तन्हा नहीं।४।
*
विष घुली नदिया सा जीवन कर के नेता चैन में
लोक उनके आचरण को क्यों भला समझा नहीं।५।
*
हो गये स्वाधीन  जब  से नींद ऐसी भा गयी
थक गये हम तो जगाते पर कोई जागा नहीं।६।
*
अब 'मुसाफिर' वो भी कहता देश पर पहला है हक
देश हित में जिस ने खुद  को  थोड़ा भी झोंका नहीं।७।
*
मौलिक/अप्रकाशित
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

Views: 239

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Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on August 15, 2023 at 1:27pm

आ. भाई विजय शंकर जी, सादर अभिवादन। गजल पर उपस्थिति व प्रशंसा के लिए आभार।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on August 15, 2023 at 1:26pm

आ. भाई रवि जी, सादर अभिवादन। गजल पर उपस्थिति और उत्साहवर्धन के लिए आभार।

Comment by Dr. Vijai Shanker on August 15, 2023 at 2:09am

आदरणीय लक्ष्मण धामी मुसाफिर जी , एक सामयिक एवं गंभीर प्रस्तुति , अच्छी लगी , हार्दिक बधाई।

Comment by Ravi Shukla on August 8, 2023 at 2:31pm

आदरणीय लक्ष्मण जी सामयिक विषय पर उम्दा शेर कहे आपने बधाई 

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